Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 812

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
श꣣ता꣡नी꣢केव꣣ प्र꣡ जि꣢गाति धृष्णु꣣या꣡ हन्ति꣢꣯ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ । गि꣣रे꣡रि꣢व꣣ प्र꣡ रसा꣢꣯ अस्य पिन्विरे꣣ द꣡त्रा꣢णि पुरु꣣भो꣡ज꣢सः ॥८१२॥

श꣣ता꣡नी꣢का । श꣣त꣢ । अ꣣नीका । इव । प्र꣢ । जि꣣गाति । धृष्णुया꣢ । ह꣡न्ति꣢꣯ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । दा꣣शु꣡षे꣢ । गि꣣रेः꣢ । इ꣣व । प्र꣢ । र꣡साः꣢꣯ । अ꣣स्य । पिन्विरे । द꣡त्रा꣢꣯णि । पु꣣रुभो꣡ज꣢सः । पु꣣रु । भो꣡ज꣢꣯सः ॥८१२॥

Mantra without Swara
शतानीकेव प्र जिगाति धृष्णुया हन्ति वृत्राणि दाशुषे । गिरेरिव प्र रसा अस्य पिन्विरे दत्राणि पुरुभोजसः ॥

शतानीका । शत । अनीका । इव । प्र । जिगाति । धृष्णुया । हन्ति । वृत्राणि । दाशुषे । गिरेः । इव । प्र । रसाः । अस्य । पिन्विरे । दत्राणि । पुरुभोजसः । पुरु । भोजसः ॥८१२॥

Samveda - Mantra Number : 812
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(धृष्णुयाः) = कामादि शत्रुओं का धर्षण करनेवाला परमात्मा [धृष्णु+या] (शत+अनीका इव) = सौ सेनाओं के समान (प्रजिगाति) = उपासक को प्राप्त होता है, और (दाशुषे) = आत्मसमर्पण करनेवाले के लिए (वृत्राणि हन्ति) = ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को नष्ट करता है। जब मनुष्य कामादि का धर्षण करने के लिए प्रवृत्त होता है, उस समय प्रभु के सान्निध्य से उसे ऐसी शक्ति प्राप्त होती है, जो सौ सेनाओं के तुल्य होती है और प्रभु के प्रति आत्मसमर्पण करनेवाले की वासनाओं का विनाश तो प्रभु ही कर देते हैं ।

इस वासना- विनाश के बाद (पुरुभोजसः) = पालक व पूरक भोज्य द्रव्यों को देनेवाले प्रभु के (दात्राणि) = सब दान (अस्य) = इस उपासक का (पिन्विरे) = प्रीणन करते हैं, इसी प्रकार (इव) = जैसे (गिरे:) = मेघ के (प्ररसाः) = उत्कृष्ट रस - पर्वतों पर उत्पन्न फलों के रस मनुष्य को तृप्त करते हैं । वस्तुतः खानेपीने की वस्तुओं का आनन्द भी वासना- विनाश के बाद आता है। उससे पहले तो ये खाने-पीने की वस्तुएँ हमें ही खा-पी जाती हैं, अत: मन्त्र के पूर्वार्ध में वासना-विनाश का उल्लेख है और उत्तरार्ध में उस पुरुभोजस् प्रभु के दिव्य अन्नों द्वारा प्रीणन का प्रसङ्ग है। यदि वासनाओं को जीतकर हमने इन अन्नों का सेवन किया तो हम कण-कण करके उत्तमता का संग्रह करनेवाले 'प्रस्कण्व' होंगे। 
Essence
हम प्रभु की शरण में जाकर वासनाओं का विनाश करें और प्रभु के दिये भोजनों से प्रीणन का अनुभव करें ।
Subject
वासनाविजय और प्रीति का अनुभव