Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 810

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स꣡ त्वं न꣢꣯श्चित्र वज्रहस्त धृष्णु꣣या꣢ म꣣ह꣡ स्त꣢वा꣣नो꣡ अ꣢द्रिवः । गा꣡मश्व꣢꣯ꣳ र꣣꣬थ्य꣢꣯मिन्द्र꣣ सं꣡ कि꣢र स꣣त्रा꣢꣫ वाजं꣣ न꣢ जि꣣ग्यु꣡षे꣢ ॥८१०॥

सः꣢ । त्वम् । नः꣣ । चित्र । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । धृष्णुया꣢ । म꣣हः꣢ । स्त꣣वानः꣢ । अ꣣द्रिवः । अ । द्रिवः । गा꣢म् । अ꣡श्व꣢꣯म् । र꣣थ्य꣢म् । इ꣣न्द्र । स꣢म् । कि꣣र । सत्रा꣢ । वा꣡ज꣢꣯म् । न । जि꣣ग्यु꣡षे꣢ ॥८१०॥

Mantra without Swara
स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानो अद्रिवः । गामश्वꣳ रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे ॥

सः । त्वम् । नः । चित्र । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । धृष्णुया । महः । स्तवानः । अद्रिवः । अ । द्रिवः । गाम् । अश्वम् । रथ्यम् । इन्द्र । सम् । किर । सत्रा । वाजम् । न । जिग्युषे ॥८१०॥

Samveda - Mantra Number : 810
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (चित्र) = [चित्+र] ज्ञान देनेवाले ! (वज्रहस्त) = [वज गतौ] क्रियाशील हाथोंवाले, अर्थात् स्वभावतः क्रियामय ! (धृष्णुया) = कामादि शत्रुओं का धर्षण करनेवाले को प्राप्त होनेवाले (महः) = तेज:स्वरूप, (स्तवान:) = सदा स्तुति किये जानेवाले (अद्रिवः) = अविनाशी अथवा आदरणीय प्रभो ! (सः त्वम्) = वे आप (नः) = हमें (रथ्यम्) = इस शरीररूप रथ के लिए अत्यन्त उत्तम (गाम्) = ज्ञानेन्द्रियरूप घोड़ों को तथा (अश्वम्) = कर्मेन्द्रियरूप घोड़ों को (संकिर) = दीजिए । यहाँ चित्रादि प्रभु के स्तुतिपरक शब्द हमें संकेत कर रहे हैं कि हम भी ज्ञानी, क्रियाशील, कामादि शत्रुओं का धर्षण करनेवाले तेजस्वी और लोगों के स्तुतिपात्र व आदणीय बनें । इस सबको सिद्ध करने के लिए ही उत्तम इन्द्रियाँ अपेक्षित हैं।

हे (इन्द्र) = सर्वशक्ति-सम्पन्न प्रभो! (न) = आप जैसे (जिग्युषे) = विजय की कामनावाले के लिए (सत्रा) = सदा (वाजम्) = शक्ति दिया करते हैं, इसी प्रकार आप हमें उत्तम कर्मेन्द्रियरूप घोड़ों को प्राप्त कराइए । इनके द्वारा हम उत्तम ज्ञान-साधना करके 'बार्हस्पत्य' तो बनें ही, साथ ही हम सब वाजों को प्राप्त करके प्रत्येक कोश को उस उस शक्ति से पूर्ण करके शान्त जीवनवाले 'शंयु’ बनें। 
Essence
प्रभुकृपा से हमें उत्तम शरीररूप रथ के अनुरूप ही ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप घोड़े प्राप्त हों ।
Subject
उत्तम रथ व अश्व