Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 8

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ ते꣢ व꣣त्सो꣡ मनो꣢꣯ यमत्पर꣣मा꣡च्चि꣢त्स꣣ध꣡स्था꣢त् । अ꣢ग्ने꣣ त्वां꣢ का꣢मये गि꣣रा꣢ ॥८॥

आ꣢ । ते꣣ । वत्सः꣢ । म꣡नः꣢꣯ । य꣣मत् । परमा꣢त् । चि꣣त् । सध꣡स्था꣢त् । स꣣ध꣢ । स्था꣣त् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । त्वाम् । का꣣मये । गिरा꣢ ॥८॥

Mantra without Swara
आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात् । अग्ने त्वां कामये गिरा ॥

आ । ते । वत्सः । मनः । यमत् । परमात् । चित् । सधस्थात् । सध । स्थात् । अग्ने । त्वाम् । कामये । गिरा ॥८॥

Samveda - Mantra Number : 8
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो!( ते वत्सः)= तेरा यह प्यारा व सदा सत्य व्यवहार करनेवाला पुत्र (परमात्)= सबसे उत्कृष्ट (सधस्थात्)= प्रभु के साथ रहने के लोक अर्थात् मोक्षलोक से (चित्=) भी (मनः)= अपने मन को (आ यमत्)= काबू करता है, अर्थात् अपने मन में मोक्षलोक की भी कामना नहीं करता। इसकी कामना होती है कि (अग्ने)= हे प्रभो ! (गिरा)= वाणी से (त्वाम्) = तुम्हें (कामये)= चाहूँ, अर्थात् संसार में रहते मैं सदा सत्य का पालन करता रहूँ। आप सत्यस्वरूप हैं। मेरी वाणी भी सत्य को ही चाहे ।
अपने सुखों को तिलाञ्जलि देकर सर्वहित-साधन में प्रवृत्त होने के कारण ये प्रभु के ‘वत्स' [प्यारे] बनते हैं। 'वत्स' ही इस मन्त्र का ऋषि है।
Essence
भावार्थ-सर्वदा सत्य विचारना, सत्य बोलना और सत्य का आचरण करना मोक्ष के आनन्द के समान है।
Subject
प्रभु का प्यारा क्या चाहता है