Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 799

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रो꣢ दी꣣र्घा꣢य꣣ च꣡क्ष꣢स꣣ आ꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयद्दि꣣वि꣢ । वि꣢꣫ गोभि꣣र꣡द्रि꣢मैरयत् ॥७९९॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । दी꣣र्घा꣡य꣢ । च꣡क्ष꣢꣯से । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयत् । दिवि꣢ । वि । गो꣡भिः꣢꣯ । अ꣡द्रि꣢꣯म् । अ । द्रि꣣म् । ऐरयत् ॥७९९॥

Mantra without Swara
इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यꣳ रोहयद्दिवि । वि गोभिरद्रिमैरयत् ॥

इन्द्रः । दीर्घाय । चक्षसे । आ । सूर्यम् । रोहयत् । दिवि । वि । गोभिः । अद्रिम् । अ । द्रिम् । ऐरयत् ॥७९९॥

Samveda - Mantra Number : 799
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रः) = सर्वशक्तिमान् प्रभु (दीर्घाय चक्षसे) = विस्तृत प्रकाश के लिए (सूर्यम्) = सूर्य को (दिवि) = द्युलोक में (आरोहयत्) = आरूढ़ करते हैं । रात्रि के समय हमारे दर्शन का वृत्त अति छोटा हो जाता है। दिन हुआ, सूर्योदय हुआ और वह दर्शन का वृत्त विशाल हो जाता है । वस्तुतः आँख सूर्य का ही तो एक छोटा रूप है (‘आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत्') । वैदिक संस्कृति में उत्पन्न होते ही बच्चे को सूर्य का दर्शन कराते हैं— ब्रह्मचारी को भी, गृहस्थ को भी तथा संन्यासी को भी । यह सब इसीलिए कि उन्हें यह प्रेरणा देनी होती है कि तुम्हें सूर्य के समान ही दीर्घदृष्टि बनना है।

यह सूर्य ही (गोभिः) = अपनी किरणों से (अद्रिम्) = मेघ को (वि- ऐरयत्) = विशिष्टरूप से प्रेरित करता है। सूर्य की किरणों से जल वाष्पीभूत होकर अन्तरिक्ष में मेघरूप से ही जाता है। सूर्य का मेघनिर्माणरूप कार्य भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्रभु की सर्वोत्कृष्ट प्राकृतिक रचना सूर्य ही है। यह प्रभु की अद्भुत विभूति है। सूर्य शरीर को नीरोग करता है और दृष्टिशक्ति को तीव्र करता है, तो बाह्य जगत् में यह मेघ-निर्माणरूप महान् कार्य करता है । इस विभूति को देखकर हमें प्रभु का स्मरण होता है।
Essence
सूर्य प्रभु की महान् विभूति है ।
 
Subject
सूर्य