Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 794

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣ते꣢न꣣ या꣡वृ꣢ता꣣वृ꣡धा꣢वृ꣣त꣢स्य꣣ ज्यो꣡ति꣢ष꣣स्प꣡ती꣢ । ता꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा हुवे ॥७९४॥

ऋते꣡न꣢ । यौ । ऋ꣣तावृ꣡धौ꣢ । ऋ꣣त । वृ꣡धौ꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । ज्यो꣡ति꣢꣯षः । पती꣢꣯इ꣡ति꣢ । ता । मि꣡त्रा꣢ । मि꣡ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । हु꣣वे ॥७९४॥

Mantra without Swara
ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती । ता मित्रावरुणा हुवे ॥

ऋतेन । यौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्य । ज्योतिषः । पतीइति । ता । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । हुवे ॥७९४॥

Samveda - Mantra Number : 794
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में यह स्पष्ट हो गया है कि प्राणापान ही सोम का पान करनेवाले हैं। (इन्द्र) = जीवात्मा का सोमपान भी इन प्राणापान के द्वारा ही होता है । एवं, (यौ मित्रावरुणा) = ये प्राण और अपान (ऋतेन) = रेतस् [नि० ३.४] के द्वारा, शक्तिशाली रक्षण के द्वारा (ऋतावृधौ) = हमारे जीवनों में यज्ञ [नि० ४.१९] की भावना को बढ़ानेवाले हैं, क्योंकि अशक्त पुरुष में उत्तम कर्मों की वृत्ति का विकास नहीं होता – सशक्त पुरुष ही यज्ञादि की वृत्तिवाला होता है। ये प्राणापान शक्ति की वृद्धि से हमारे जीवनों में यज्ञात्मक कर्मों की वृद्धि करते हैं और (ऋतस्य) = सत्य के [नि० ३.१०] तथा (ज्योतिषः) = विशोका ज्योतिष्मती प्रज्ञा के ये प्राणापान (पती) = रक्षक हैं । इन प्राणापानों की साधना से – १. शक्ति की रक्षा होती है, २. हमारे जीवन में यज्ञात्मक कर्मों की प्रवृत्ति होती है, ३. हमारा मन सत्यप्रवण होता है और ४. हमें वह ज्योति प्राप्त होती है, जो एकत्व का दर्शन कराती हुई हमें शोकमोहातीत बनाती है। एवं, अत्यन्त उपकारक ता मित्रावरुणा=उन प्राणापानों को हुवे-हम पुकारते हैं। प्राणापानों की साधना का महत्त्व सुव्यक्त है। प्राणापान ही से दोषों का नाश होता है ।
Essence
प्राणापान की साधना से हम सशक्त, यज्ञिय मनोवृत्तिवाले, सत्यवादी व ज्योतिर्मय मस्तिष्कवाले बनें ।
Subject
रेतस्-यज्ञ-सत्य व ज्योति