Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 787

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानस्य ते व꣣यं꣢ प꣣वि꣡त्र꣢मभ्युन्द꣣तः꣢ । स꣣खित्व꣡मा वृ꣢꣯णीमहे ॥७८७॥

प꣡व꣢꣯मानस्य । ते꣣ । वय꣢म् । प꣣वि꣡त्र꣢म् । अ꣣भ्युन्द꣢तः । अ꣣भि । उन्दतः꣢ । स꣣खित्व꣢म् । स꣣ । खित्व꣢म् । आ । वृ꣣णीमहे ॥७८७॥

Mantra without Swara
पवमानस्य ते वयं पवित्रमभ्युन्दतः । सखित्वमा वृणीमहे ॥

पवमानस्य । ते । वयम् । पवित्रम् । अभ्युन्दतः । अभि । उन्दतः । सखित्वम् । स । खित्वम् । आ । वृणीमहे ॥७८७॥

Samveda - Mantra Number : 787
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मन्त्र का ऋषि ‘अमहीयु आङ्गिरस' है । पार्थिव भोगों की कामना न करनेवाला, अतएव अङ्गप्रत्यङ्ग में शक्तिशाली । प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि प्रभु की आराधना करते हुए कहता है कि वयम्=कर्मतन्तु का विच्छेद न करनेवाले [वेञ् तन्तुसन्ताने] हम (पवमानस्य) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले तथा (पवित्रम् अभ्युन्दतः) = पवित्र बने हुए को अपने करुणाजल से क्लिन्न [उन्दी क्लेदने] करनेवाले (ते) = आपके (सखित्वम्) = मित्रभाव को आवृणीमहे सर्वथा वरते हैं । महान् पार्थिव भोगों को भी तुच्छ समझते हुए हम उन्हें त्यागते हैं और आपका वरण करते हैं। पार्थिव भोगों के लिए हम आपको अपने से दूर नहीं करते। [महेचन त्वामद्रिवः पराशुल्काय देयाम् ] । प्रेयमार्ग की चमक हमें आपके श्रेयमार्ग से नहीं हटाती । हम 'सन्तति, सम्पत्ति व भोगों तथा दीर्घजीवन' को छोड़कर आपको ही चाहते हैं। आप हमारे जीवनों को पवित्र करते हैं। आपके वरण से हम प्रकृतिपंक से ऊपर उठते हैं। पवित्र बनकर हम आपकी कृपा के पात्र होते हैं । एवं, आपका सखित्व हमें क्रोधादि प्रचण्ड शक्तिवाली वासनाओं को जीतने में समर्थ बनाता है। हमारा जीवन अधिकाधिक पवित्र होता जाता है। 
Essence
प्रभु का सखित्व हमें पवित्र करता है। पवित्र बनने पर हम प्रभु की कृपा के पात्र होते हैं।
Subject
सखित्व का वरण