Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 785

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢द꣣द्भिः꣡ प꣢रिषि꣣च्य꣡से꣢ मर्मृ꣣ज्य꣡मा꣢न आ꣣यु꣡भिः꣢ । द्रो꣡णे꣢ स꣣ध꣡स्थ꣢मश्नुषे ॥७८५॥

यत् । अ꣡द्भिः꣢ । प꣣रिषिच्य꣡से꣢ । प꣣रि । सिच्य꣡से꣢ । म꣣र्मृज्य꣡मा꣢नः । आ꣣यु꣡भिः꣢ । द्रो꣡णे꣢꣯ । स꣣ध꣡स्थ꣢म् । स꣣ध꣢ । स्थ꣣म् । अश्नुषे ॥७८५॥

Mantra without Swara
यदद्भिः परिषिच्यसे मर्मृज्यमान आयुभिः । द्रोणे सधस्थमश्नुषे ॥

यत् । अद्भिः । परिषिच्यसे । परि । सिच्यसे । मर्मृज्यमानः । आयुभिः । द्रोणे । सधस्थम् । सध । स्थम् । अश्नुषे ॥७८५॥

Samveda - Mantra Number : 785
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
शरीर में उत्पन्न होनेवाली सोम-शक्ति मानव जीवन के उत्थान का मूल है। शरीर में सुरक्षित होने पर यह अन्त में मनुष्य का ‘परमात्मतत्त्व' से मेल कराने का साधन बनती है। स्वास्थ्य, नैर्मल्य व ज्ञान की दीप्ति का कारण बनकर यह उसे प्रभु का दर्शन कराती है। प्रस्तुत मन्त्र में उसी का वर्णन करते हुए कहते हैं कि (यत्) = जो (अद्भिः) = कर्मों के द्वारा (परिषिच्यसे) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग में सिक्त होता है और (आयुभिः) = [इण्-गतौ] गतिशील पुरुषों के द्वारा (मर्मृज्यमानः) = निरन्तर शुद्ध किया जाता है, उस समय (द्रोणे) = [द्रु- गतौ] गति के आधार बने इस शरीर में (सधस्थम्) = आत्मा व परमात्मा की सहस्थिति को (अश्नुषे) = प्राप्त करता है । 

जब मनुष्य कर्मों में लगा रहता है तब इस सोम का व्यय अङ्ग-प्रत्यङ्ग के निर्माण में होता है । ‘सोम की खपत शरीर में ही हो जाए' इसके लिए आवश्यक है कि हम सदा कर्मों में लगे रहें । अकर्मण्य शरीर में ' सोमपान' की शक्ति नहीं होती । गतिशील बने रहने से ही सोम शुद्ध बना रहता है, उसमें वासना-जन्य उबाल उत्पन्न नहीं होता । द्रोण में [गतिशील में] ही यह सोम अन्ततः आत्मा व परमात्मा की सहस्थिति को उत्पन्न करता है। एवं, क्रियाशीलता से सोम शरीर में ही सिद्ध होता है और शुद्ध बना रहता है तथा यह शरीर में व्याप्त शुद्ध सोम हमें प्रभु से मिला है। ।

सोम-रक्षा से अपने जीवन का ठीक परिपाक करनेवाला प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘भृगुः' है, उत्तम जीवनवाला होने से यह ‘वारुणि' है। पूर्ण स्वस्थ शरीरवाला यह 'जमदग्नि' है और परिपक्व ज्ञानवाला ‘भार्गव' है ।
Essence
कर्मों के द्वारा हम सोम की रक्षा करें । सुरक्षित सोम हमें प्रभु की सहस्थिति को प्राप्त कराएगा |
Subject
प्रभु के साथ