Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 78

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ स꣣म्रा꣢ज꣣म꣡सु꣢रस्य प्रश꣣स्तं꣢ पु꣣ꣳसः꣡ कृ꣢ष्टी꣣ना꣡म꣢नु꣣मा꣡द्य꣢स्य । इ꣡न्द्र꣢स्येव꣣ प्र꣢ त꣣व꣡स꣢स्कृ꣣ता꣡नि꣢ व꣣न्द꣡द्वा꣢रा꣣ व꣡न्द꣢माना विवष्टु ॥७८॥

प्र꣢ । स꣣म्रा꣡ज꣢म् । स꣣म् । रा꣡ज꣢꣯म् । अ꣡सु꣢꣯रस्य । अ । सु꣣रस्य । प्रशस्त꣢म् । प्र꣣ । शस्त꣢म् । पुँ꣣सः꣢ । कृ꣣ष्टीना꣢म् । अ꣣नुमा꣡द्य꣢स्य । अ꣣नु । मा꣡द्य꣢꣯स्य । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । इ꣣व । प्र꣢ । त꣣व꣡सः꣢ । कृ꣣ता꣡नि꣢ । व꣣न्द꣡द्वा꣢रा । व꣡न्द꣢꣯माना । वि꣣वष्टु ॥७८॥

Mantra without Swara
प्र सम्राजमसुरस्य प्रशस्तं पुꣳसः कृष्टीनामनुमाद्यस्य । इन्द्रस्येव प्र तवसस्कृतानि वन्दद्वारा वन्दमाना विवष्टु ॥

प्र । सम्राजम् । सम् । राजम् । असुरस्य । अ । सुरस्य । प्रशस्तम् । प्र । शस्तम् । पुँसः । कृष्टीनाम् । अनुमाद्यस्य । अनु । माद्यस्य । इन्द्रस्य । इव । प्र । तवसः । कृतानि । वन्दद्वारा । वन्दमाना । विवष्टु ॥७८॥

Samveda - Mantra Number : 78
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि वसिष्ठ=मन व इन्द्रियों को पूर्णरूप से वश मे करनेवाला [वशिनां श्रेष्ठः] अथवा सर्वोत्तम ढङ्ग से इस शरीररूपी नगरी में रहनेवाला [वसूनां श्रेष्ठ:] (प्र विवष्टु) = विशेषरूप से खूब कामना करे । कामना से रहित जीवन जड़ जीवन है, परन्तु काम में फँस जाना ठीक नहीं। (‘कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता') = । वेदादि सच्छास्त्रों का पढ़ना तथा सारा वैदिक कर्मयोग भी कामना होने पर ही होता है। ('काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः')। वसिष्ठ ने कामशून्य होना तो नहीं माना है, परन्तु प्रश्न यह है कि 'वह किन-किन वस्तुओं की कामना करे?" 4

(असुरस्य सम्राजम् )= प्राणशक्ति के पुञ्ज व प्रज्ञान धन से सम्यक् शासित जीवन को [सम्=मसस राजम्=regulated] चाहे। असु शब्द प्राण व प्रज्ञा का वाचक है। 'र' प्रत्यय ‘वाला' अर्थ में आता है। आदर्श मनुष्य वही है जो प्राणशक्ति व ज्ञान से सम्पन्न है-Body of an athlete and the soul of a sage । वसिष्ठ की दूसरी कामना हो कि

(प्रशस्तं पुंसः) = उदार मनवाले पुरुष की भाँति मेरा प्रत्येक कर्म प्रशस्त हो [पुमान् पुरुमना भवति–नि० ९.१५] । अनुदारता व संकुचितता के कारण ही अपवित्रता आया करती है। जो उदार मनवाला पुरुष है, वह (कृष्टीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों की (अनुमाद्यस्य) = प्रसन्नता में प्रसन्न होनेवाला है [अनु=पीछे, मदी हर्षे] दूसरों के उत्कर्ष को देखकर जलना अपवित्र व संकुचित हृदय का चिह्न है। इस वसिष्ठ की तीसरी कामना यह हो कि

प्(र तवस:)=प्रबल शक्तिवाले इ(न्द्रस्य इव) = इन्द्र की भाँति मेरे (कृतानि) = उत्तम कर्म (वन्दमाना )= [वन्द्यमानानि] वन्दना व स्तुति के योग्य हों। निर्बलता मूलक कोई भी कर्म शुभ नहीं हो सकता। ‘तवस' शब्द शक्ति व उत्तमता का वाचक होते हुए इस भावना को ही सूचित कर रहा है। कायरता कभी धर्म की जननी नहीं हो सकती। वैदिक साहित्य में बल के सब कर्म इन्द्र के हैं, अतः वसिष्ठ के कर्म भी शक्तिशाली इन्द्र के कर्मों की भाँति होते हैं। परन्तु ये तीन बातें १. कार्यों में नियमितता [regularity], २. हृदय में उदारता व ३. शक्तिसम्पन्नता आएँगी किस प्रकार इस प्रश्न का उत्तर यह है कि

(वन्दद्वारा) = वन्दना के द्वारा । प्रातः - सायं प्रभु की स्तुति से ही वसिष्ठ का जीवन उल्लिखित ढङ्ग का बन सकता है।
Essence
हमारे कार्यों में नियमितता, उदारता व शक्तिसम्पन्नता का प्रकाश [आभास] हो ।
Subject
क्या चाहें?