Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 779

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡स्य꣢ ते स꣣ख्ये꣢ व꣣य꣡ꣳ सा꣢स꣣ह्या꣡म꣢ पृतन्य꣣तः꣢ । त꣡वे꣢न्दो द्यु꣣म्न꣡ उ꣢त्त꣣मे꣢ ॥७७९॥

य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । सख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । व꣣य꣢म् । सा꣣सह्या꣡म꣢ । पृ꣣तन्यतः꣢ । त꣡व꣢꣯ । इ꣣न्दो । द्युम्ने꣢ । उ꣣त्तमे꣢ ॥७७९॥

Mantra without Swara
यस्य ते सख्ये वयꣳ सासह्याम पृतन्यतः । तवेन्दो द्युम्न उत्तमे ॥

यस्य । ते । सख्ये । स । ख्ये । वयम् । सासह्याम । पृतन्यतः । तव । इन्दो । द्युम्ने । उत्तमे ॥७७९॥

Samveda - Mantra Number : 779
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्दो) = शक्तिशाली परमात्मन् ! (वयम्) = हम (तव) = तेरी उस (उत्तमे) = सर्वोत्कृष्ट द्युम्ने ज्योति में हों (यस्य ते) = जिस तेरी (सख्ये) = मित्रता में (पृतन्यतः) = हमपर आक्रमण करनेवाले रोगादि को (सासह्याम) = पराभूत कर सकें ।

इस संसार में मनुष्य वासनाओं से आक्रान्त होता है । वासनाओं के साथ वह संघर्ष करता है । इस संघर्ष में मनुष्य अपने को अशक्त अनुभव करता है, परन्तु प्रभु को मित्र बनाकर उसके साहाय्य से यह इन वासनाओं को जीत पाता है। प्रभु के उत्तम ज्ञान के प्रकाश में अन्धकार में पनपनेवाली वासनाएँ ठहर नहीं पाती । एवं, इस संसार में जीव के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात प्रभु की मित्रता है—यही उसे इस भवसागर से पार तैराती है। प्रभु की मित्रता को चाहने व पानेवाला 'अमहीयु' है - यह पार्थिव भोगों की कामना से ऊपर उठ गया है । इन भोगों से ऊपर उठ जाने के — कारण ही ‘आङ्गिरस' है – शक्तिशाली है । 
Essence
प्रभु की मित्रता में हम काम-क्रोधादि शत्रुओं का धर्षण करनेवाले हों ।
Subject
शत्रु- धर्षण