Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 776

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ स꣢मु꣣द्रि꣡या꣢ अ꣣पो꣢ऽग्रि꣣यो꣡ वाच꣢꣯ ई꣣र꣡य꣢न् । प꣡व꣢स्व विश्वचर्षणे ॥७७६॥

त्वम् । स꣣मुद्रि꣡याः꣢ । स꣣म् । उद्रि꣡याः꣢ । अ꣣पः꣢ । अ꣣ग्रि꣢यः । वा꣡चः꣢꣯ । ई꣣र꣡य꣢न् । प꣡व꣢꣯स्व । वि꣣श्वचर्षणे । विश्व । चर्षणे ॥७७६॥

Mantra without Swara
त्वꣳ समुद्रिया अपोऽग्रियो वाच ईरयन् । पवस्व विश्वचर्षणे ॥

त्वम् । समुद्रियाः । सम् । उद्रियाः । अपः । अग्रियः । वाचः । ईरयन् । पवस्व । विश्वचर्षणे । विश्व । चर्षणे ॥७७६॥

Samveda - Mantra Number : 776
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (विश्वचर्षणे) = विश्वद्रष्टः=सबका ध्यान करनेवाले प्रभो ! (अग्रियः) = आप निर्माण से पहले ही हो, अर्थात् आप कभी बने नहीं, आपको बनानेवाला कोई नहीं, आप स्वयं भू, खुद + आ हो । आप ही सभी का निर्माण करनेवाले हो। (त्वम्) = आप (समुद्रियाः) = समुद्र=[हृदयान्तरिक्ष] हृदय से किये जानेवाले (अप:) = कर्मों को अथवा (समुद्रिया:) = [स-मुद्] वास्तविक आनन्द पैदा करनेवाले कर्मों को तथा (वाच:) = वेदवाणियों को (ईरयन्) = हममें प्रेरित करते हुए हमें पवस्व प्राप्त होओ और हमें पवित्र करो ।

प्रभु‘विश्वचर्षणि’ हैं— सबका ध्यान करनेवाले, सच्चे माता-पिता हैं । वे प्रभु काल से अविच्छिन्न होने के कारण सदा से हैं— वे हमें कर्म व ज्ञान की प्रेरणा प्राप्त कराते हैं और इन कर्म व ज्ञान की प्रेरणाओं से हमारे जीवनों को शुद्ध करते हैं। उत्तम कर्मोंवाला सदा सशक्त व स्वस्थ मैं 'जमदग्नि' बनता हूँ। वेदवाणियों को प्राप्त करके ज्ञानाग्नि से अपने को परिपक्व करनेवाला मैं ‘भार्गव' होता हूँ।
Essence
मेरे कर्म समुद्रिय हों- मन से होनेवाले हों तथा सदा आनन्दपूर्वक किये जाएँ। इन कर्मों के साथ मैं सदा वेदवाणी को अपनानेवाला बनूँ ।
 
Subject
अपः+वाचः=कर्म+ज्ञान