Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 771

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡दीं꣢ त्रि꣣त꣢स्य꣣ यो꣡ष꣢णो꣣ ह꣡रि꣢ꣳ हिन्व꣣न्त्य꣡द्रि꣢भिः । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य पी꣣त꣡ये꣢ ॥७७१॥

आ꣢त् । ई꣣म् । त्रित꣡स्य꣢ । यो꣡ष꣢꣯णः । ह꣡रि꣢꣯म् । हि꣣न्वन्ति । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । इ꣡न्दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पी꣣त꣡ये꣢ ॥७७१॥

Mantra without Swara
आदीं त्रितस्य योषणो हरिꣳ हिन्वन्त्यद्रिभिः । इन्दुमिन्द्राय पीतये ॥

आत् । ईम् । त्रितस्य । योषणः । हरिम् । हिन्वन्ति । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । इन्दुम् । इन्द्राय । पीतये ॥७७१॥

Samveda - Mantra Number : 771
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(आत्) = अब (ईम्) = निश्चय से (त्रितस्य) = काम-क्रोध-लोभ से तीर्ण 'त्रित' की (योषणः) = [यु अमिश्रण] अपने को दोषों से दूर करने की वृत्तियाँ (अद्रिभिः) = दृढ़ मनोवृत्तियों से (हरिम्) = सब दु:खों को हरनेवाले प्रभु को (हिन्वन्ति) = प्राप्त कराती हैं। प्रभु प्राप्ति का मार्ग यह है कि१. मनुष्य 'काम, क्रोध, लोभ' को जीतकर 'त्रित' बनें, २. वह अपने को यथासम्भव दोषों से पृथक् करे [योषण: ], ३. दृढ़ मनोवृत्तिवाला हो [अद्रिभिः]।

प्रभु ने शरीर में आहार के पाचन की व्यस्था में अन्तिम धातु के रूप में वीर्य को उत्पन्न किया है। वह वीर्य ‘इन्दु' कहलाता है, क्योंकि यह अत्यन्त शक्तिशाली है । मन्त्र के ऋषि (‘श्यावाश्व आत्रेय') = इस (इन्दुम्) = इन्दु को (हिन्वन्ति) = शरीर में ही प्रेरित करते हैं, जिससे १. (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यनिधान प्रभु की प्राप्ति कर सकें और २. (पीतये) = शरीर की रोगों से रक्षा कर सकें [पा-रक्षणे]। शरीर में सोम की रक्षा जहाँ शरीर को नीरोग रखती है, वहाँ यह मनुष्य को पवित्र हृदय व तीक्ष्ण बुद्धि बनाकर प्रभु-दर्शन के भी योग्य करती है ।
Essence
हम सोम का पान करें, जिससे प्रभु-दर्शन प्राप्त करें तथा नीरोग हों। नीरोगता ऐहिक लाभ है तो प्रभु-प्राप्ति आमुष्मिक । ये दोनों ही लाभ सोम को शरीर में सुरक्षित करने से होते हैं।
Subject
नीरोगता व प्रभु-प्राप्ति