Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 760

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दु꣣हानः꣢ प्र꣣त्न꣡मित्पयः꣢꣯ प꣣वि꣢त्रे꣣ प꣡रि꣢ षिच्यसे । क्र꣡न्दं꣢ दे꣣वा꣡ꣳ अ꣢जीजनः ॥७६०॥

दुहानः꣢ । प्र꣡त्न꣢म् । इत् । प꣡यः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । प꣡रि꣢꣯ । सि꣣च्यसे । क्र꣡न्द꣢꣯न । दे꣣वा꣢न् । अ꣣जीजनः ॥७६०॥

Mantra without Swara
दुहानः प्रत्नमित्पयः पवित्रे परि षिच्यसे । क्रन्दं देवाꣳ अजीजनः ॥

दुहानः । प्रत्नम् । इत् । पयः । पवित्रे । परि । सिच्यसे । क्रन्दन । देवान् । अजीजनः ॥७६०॥

Samveda - Mantra Number : 760
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह मेध्यातिथि (इत्) = निश्चय से (प्रत्नम् पय:) = सनातन, वृद्धि के साधनभूत वेदज्ञान को | (दुहान:) = अपने में भरता हुआ (पवित्रे) = पवित्र प्रभु में (परिषिच्यसे) = परिषिक्त होता है। जैसे नदी समुद्र में, उसी प्रकार यह उस प्रभु में समा जाता है । वह सदा (क्रन्दम्) - उस प्रभु को पुकारता हुआ देवान्- दिव्यगुणों को अजीजन:-अपने में उत्पन्न करता है ।

दिव्य गुणों को बढ़ाते-बढ़ाते देव बनकर ही वस्तुतः कोई भी व्यक्ति प्रभु का सच्चा उपासक होता है | दिव्य-गुणों को बढ़ाने के लिए प्रभु को पुकारना आवश्यक है। बिना प्रभु को आगे किये, वासनाओं को हम स्वयं 

नितान्त आवश्यक है । ज्ञानाग्नि ही तो हमें पवित्र बनाती है। ये दोनों बातें [प्रभु-स्मरण व ज्ञानप्राप्ति] उसे इस योग्य बनाती हैं कि यह प्रभु का ज्ञान प्राप्त करे, साक्षात्कार करे और उसमें समा जाए। प्रभु की सर्वव्यापकता के नाते ज्ञान-प्राप्ति से पूर्व भी हम प्रभु में हैं, परन्तु उस प्रकार तो सब पशु-पक्षी भी उसी में हैं। ज्ञान होने पर जब हम प्रभु में समाएँगे, तब वास्तविक आनन्द का लाभ कर सकेंगे।
Essence
मैं ज्ञानी बनूँ, देव बनूँ, जिससे प्रभु को पा सकूँ ।
Subject
प्रभु में समा जाना