Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 759

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ म꣡न्म꣢ना दे꣣वो꣢ दे꣣वे꣢भ्य꣣स्प꣡रि꣢ । क꣣वि꣡र्विप्रे꣢꣯ण वावृधे ॥७५९॥

ए꣣षः꣢ । प्र꣣त्ने꣡न꣢ । म꣡न्म꣢꣯ना । दे꣣वः꣢ । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । क꣡विः꣢ । वि꣡प्रे꣢꣯ण । वि । प्रे꣣ण । वावृधे ॥७५९॥

Mantra without Swara
एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि । कविर्विप्रेण वावृधे ॥

एषः । प्रत्नेन । मन्मना । देवः । देवेभ्यः । परि । कविः । विप्रेण । वि । प्रेण । वावृधे ॥७५९॥

Samveda - Mantra Number : 759
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) = यह मेध्यातिथि काण्व (प्रत्नेन) = उस सनातन मन्मना-ज्ञान-साधन वेद से या दीर्घकालीन मनन से (देवेभ्यः) = माता-पिता, आचार्य व अतिथियों से नियमपूर्वक ज्ञान प्राप्त करके (देवः) = ज्ञानी बनता है। (कविः) = क्रान्तदर्शी बनकर (विप्रेण) = एक विशेष पूरण के द्वारा (परिवावृधे) = सर्वतोभावेन विकास करता है ।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए १. सनातन वेदवाणी का अध्ययन आवश्यक है, २. उसके अर्थों का दीर्घकाल तक निरन्तर आदर- [ श्रद्धा] - पूर्वक मनन करना है और ३. देवों के सम्पर्क में रहकर नियमपूर्वक उनसे ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना है। जो भी व्यक्ति इन तीन बातों का ध्यान करेगा वह ज्ञानी क्यों न बनेगा? वह संसार की वस्तुओं को बारीकी से देखकर (कवि:) = क्रान्तदर्शी होगा। यह क्रान्तदर्शित्व ही उसे विषयों का शिकार न होने देकर उन्नति के मार्ग पर ले-चलेगा । यह अपने जीवन में अधिकाधिक दिव्यता का पूरण करता हुआ 'शरीर, मन व बुद्ध' सभी का विकास कर पाएगा। ‘विप्र' शब्द की भावना 'विशेष - पूरण' की है। तीनों का विकास ही विशिष्ट पूरण है । 
Essence
वेदज्ञान को प्राप्त कर, उसे अपने जीवन में ढालकर, हम अपना पूरण करें ।
Subject
सनातन ज्ञान [ The Eternal Knowledge ]