Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 757

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ विश्वा꣢꣯नि तिष्ठति पुना꣣नो꣡ भुव꣢꣯नो꣣प꣡रि꣢ । सो꣡मो꣢ दे꣣वो꣡ न सूर्यः꣢꣯ ॥७५७॥

अ꣣य꣢म् । वि꣡श्वा꣢꣯नि । ति꣣ष्ठति । पुनानः꣢ । भु꣡व꣢꣯ना । उ꣣प꣡रि꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । दे꣡वः꣢ । न । सू꣡र्यः꣢꣯ ॥७५७॥

Mantra without Swara
अयं विश्वानि तिष्ठति पुनानो भुवनोपरि । सोमो देवो न सूर्यः ॥

अयम् । विश्वानि । तिष्ठति । पुनानः । भुवना । उपरि । सोमः । देवः । न । सूर्यः ॥७५७॥

Samveda - Mantra Number : 757
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) = यह अवत्सार गत मन्त्र के सात प्रवतों में ऊपर और ऊपर चढ़ता हुआ (विश्वानि भुवना उपरि) = सब भुवनों के ऊपर (तिष्ठति) = ठहरता है । ऐसा वह इसलिए कर पाता है कि वह पुनान:-अपने को पवित्र करने के स्वभाववाला है। ज्ञान से वह अधिकाधिक निर्मल होता जाता है और ऊँचे और ऊँचे लोक में पहुँचता हुआ 'ऊर्ध्वा दिक्’ का अधिपति बनता है। इस दिशा का अधिपति बृहस्पति ही तो है । बृहस्पति और काश्यप एक ही हैं — दोनों का अर्थ ज्ञानी है। 

सर्वोच्च स्थान में स्थित होता हुआ भी यह (सोमः) = विनीत होता है । विशेषता तो यह है कि सबसे उन्नत और सबसे विनीत । ('ब्रह्मणा अर्वाङ् विपश्यति') = ज्ञान के कारण यह सदा नीचे देखता है, अर्थात् नम्र होता है। सोम शब्द का अर्थ ‘स+उमा'=‘ब्रह्मज्ञानसहित' है, इस ब्रह्मज्ञान के कारण यह (देव: न सूर्य:) = सूर्य के समान चमकनेवाला है। जैसे सूर्य द्युलोक में स्थित है उसी प्रकार यह भी मस्तिष्करूप द्युलोक में स्थित होता है - ज्ञान प्रधान जीवन बिताता है । 
Essence
हम सदा ज्ञानावस्थित चित्तवाले बनें ।
Subject
सर्वोच्च स्थान में