Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 749

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ए꣣ना꣡ वो꣢ अ꣣ग्निं꣡ नम꣢꣯सो꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣मा꣡ हु꣢वे । प्रि꣣यं꣡ चेति꣢꣯ष्ठमर꣣ति꣡ꣳ स्व꣢ध्व꣣रं꣡ विश्व꣢꣯स्य दू꣣त꣢म꣣मृ꣡त꣢म् ॥७४९॥

ए꣣ना꣢ । वः꣣ । अग्नि꣢म् । न꣡म꣢꣯सा । ऊ꣣र्जः꣢ । न꣡पा꣢꣯तम् । आ । हु꣣वे । प्रिय꣢म् । चे꣡ति꣢꣯ष्ठम् । अरति꣢म् । स्व꣣ध्वर꣢म् । सु꣣ । अध्वर꣢म् । वि꣡श्व꣢꣯स्य । दू꣣त꣢म् । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् ॥७४९॥

Mantra without Swara
एना वो अग्निं नमसोर्जो नपातमा हुवे । प्रियं चेतिष्ठमरतिꣳ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम् ॥

एना । वः । अग्निम् । नमसा । ऊर्जः । नपातम् । आ । हुवे । प्रियम् । चेतिष्ठम् । अरतिम् । स्वध्वरम् । सु । अध्वरम् । विश्वस्य । दूतम् । अमृतम् । अ । मृतम् ॥७४९॥

Samveda - Mantra Number : 749
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वामदेव = सुन्दर, दिव्य गुणों को अपनानेवाला यह ऋषि कहता है कि (एना नमसा) = इस नमन‘उपासना' के द्वारा मैं (आहुवे) = उस प्रभु को पुकारता हूँ, जो -

१. (वः अग्निम्) = तुम सबको आगे ले-चलनेवाला है, जिसके आश्रय से ही सभी प्रकार की प्रगति होती है। २. (ऊर्ज:नपातम्) = मैं उस प्रभु को पुकारता हूँ जो ‘शक्ति को न गिरने देनेवाला है।' प्रभु-स्मरण से वासनाएँ हमसे दूर रहती हैं, अतः हमारी शक्ति के नाश का कारण नहीं बनतीं । ३. (प्रियम्) = वे प्रभु तृप्ति देनेवाले हैं, अर्थात् प्रभु को छोड़कर कोई भी सांसारिक वस्तु हमें तृप्त नहीं कर सकती । सम्पूर्ण पृथिवी के सारे धन-धान्य से भी मनुष्य की तृप्ति नहीं होती । ४. (चेतिष्ठम्) = वे प्रभु निरतिशय ज्ञानवाले हैं। अपने भक्त को भी हृदयस्थरूपेण ज्ञान देते हैं । ५. (अरतिम्) = वे प्रभु संसार में आसक्त नहीं हैं, अपने भक्त को भी संसार से अनासक्त बनाते हैं । ६. (स्वध्वरम्) = वे पूर्ण अहिंसक हैं— हमारे जीवन-यज्ञों को भी हिंसाशून्य बनानेवाले हैं । ७. (विश्वस्य दूतम्) = सम्पूर्ण ज्ञान के उपदेष्टा हैं। तथा ८. (अमृतम्) = अमर हैं । भक्त को भी ज्ञान के द्वारा जीवन-मृत्यु के चक्र से ऊपर उठानेवाले हैं। [अविद्यमानं मृतं यस्मात्] ।

उपासक की उपासना सच्ची होती है तो वह भी उपास्य जैसा ही बन जाता है । वामदेव उल्लिखित ८ गुणों से प्रभु का स्मरण करता हुआ उन्हीं अष्ट गुणों की प्राप्ति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाता है और उन गुणों को प्राप्त करके 'वामदेव' अपने इस नाम को सार्थक करता है।
Essence
वामदेव की उपासना में सम्मिलित हो हम भी 'वामदेव' बन जाएँ ।
Subject
वामदेव की उपासना