Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 747

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नारदः काण्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स꣡ प्र꣢थ꣣मे꣡ व्यो꣢मनि दे꣣वा꣢ना꣣ꣳ स꣡द꣢ने वृ꣣धः꣢ । सु꣣पारः꣢ सु꣣श्र꣡व꣢स्तमः꣣ स꣡म꣢प्सु꣣जि꣢त् ॥७४७॥

सः । प्र꣣थमे꣢ । व्यो꣡म꣢नि । वि । ओ꣣मनि । दे꣣वा꣡ना꣢म् । स꣡द꣢꣯ने । वृ꣢धः꣡ । सु꣣पा꣢रः । सु꣣ । पारः꣡ । सु꣣श्र꣡व꣢स्तमः । सु꣣ । श्र꣡व꣢꣯स्तमः । सम् । अ꣣प्सुजि꣣त् । अ꣣प्सु । जि꣢त् ॥७४७॥

Mantra without Swara
स प्रथमे व्योमनि देवानाꣳ सदने वृधः । सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित् ॥

सः । प्रथमे । व्योमनि । वि । ओमनि । देवानाम् । सदने । वृधः । सुपारः । सु । पारः । सुश्रवस्तमः । सु । श्रवस्तमः । सम् । अप्सुजित् । अप्सु । जित् ॥७४७॥

Samveda - Mantra Number : 747
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(सः) = वह महापुरुष (वृधः) = वृद्धि करनेवाला [वर्धत् इति वृधः, वृध्+क] होता है, परन्तु किस क्षेत्र में ? (प्रथमे व्योमनि) = उत्कृष्ट हृदयान्तरिक्ष में । वैदिक साहित्य में बाह्य आकाश की तुलना में हृदयाकाश को उत्तम कहा गया है 'प्रथमे व्योमनि' का ही पर्यायवाची 'परमे परार्द्धे' है । यही जीव ‘आत्मस्वरूप' का दर्शन कर पाता है । यह आत्मा का विशिष्ट निवास स्थान होने से सचमुच 'व्योम' है [वि+ओम्] । महान् वह है जो इस हृदयाकाश के क्षेत्र में उन्नति की साधना करता है । 'प्रथमे' शब्द का अर्थ 'प्रथ विस्तारे' से विस्तृत भी होता है, अतः हृदय की उन्नति इसे विस्तृत बनाने में ही है। संकुचित हृदय अपवित्र होता है और (मह:) = महत्त्व इसे पवित्र कर डालता है ('महः पुनातु हृदये') = । महान् व्यक्ति वह, जिसका हृदय महान् है।

(सः) = वह महान् व्यक्ति (देवानां सदने) = देवताओं के निवास स्थान में (वृधः) = वृद्धि करता है । सामान्य मनुष्यों के जीवनों में काम-क्रोध उसकी इन्द्रियों, मन व बुद्धि को अपना निवास स्थान बनाते हैं। महान् वह है जो त्रिपुरारि [महादेव] बनकर असुरों का पराजय करता है और इन्हें देवों का सदन बना देता है। इसका काम 'प्रेम' में परिवर्तित हो जाता है और क्रोध 'मन्यु’ में। इसके जीवन में ये सब असुर अपने पूर्वरूपों में आ जाते हैं । प्रेम ही तो विकृत होकर 'काम' बन गया था और मन्यु ही ‘क्रोध’। असुर भी तो ‘पूर्व-देव' ही हैं।

३. (सु-पार:) = हृदय की पवित्रता व दिव्य गुणों के सम्पादन के कारण ही यह प्रत्येक कार्य को (सु) = उत्तमता से (पारः) = समाप्ति तक ले जानेवाला होता है। अधम विघ्न-भय से कार्य को प्रारम्भ ही नहीं करता तो मध्यम विघ्नों के आने पर बीच में ही रुक जाता है । महान् वही है जो विघ्नों से शतशः आहत होने पर भी कार्य को समाप्ति तक ले-चलता है ।

४. (सु- श्रवस्-तमः) - यह महापुरुष कार्यों को समाप्ति तक ले चलने से 'उत्तम यशवाला' होता है। चारों ओर इसकी ख्याति फैलती है। अधिक-से-अधिक प्रसिद्ध होता हुआ भी वह अहंभाव से शून्य है। इस निरभिमानिता से इसका यश और भी सुन्दर प्रतीत होता है ।

५. (सम् अप्सु जित्) = अपनी सफलताओं=achievements से यशस्वी होता हुआ भी, क्योंकि यह अहंकारशून्य होता है, अतः यह कार्यों से बद्ध नहीं होता। (अप्सु) = कर्मों को करता हुआ भी यह नहीं कर रहा होता । यही नर है – यही महान् है ।
 
Essence
महान् के पाँचों लक्षणों को अपने जीवन में अनूदित करके मैं सचमुच ‘पञ्च-जन' बनूँ।
Subject
महान् का लक्षण पञ्चक