Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 745

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ घा꣢ गम꣣द्य꣢दि꣣ श्र꣡व꣢त्सह꣣स्रि꣡णी꣢भिरू꣣ति꣡भिः꣢ । वा꣡जे꣢भि꣣रु꣡प꣢ नो꣣ ह꣡व꣢म् ॥७४५॥

आ । घ꣣ । गमत् । य꣡दि꣢꣯ । श्र꣡व꣢꣯त् । स꣣हस्री꣡णी꣢भिः । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ । वा꣡जे꣢꣯भिः । उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । ह꣡वम्꣢꣯ ॥७४५॥

Mantra without Swara
आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः । वाजेभिरुप नो हवम् ॥

आ । घ । गमत् । यदि । श्रवत् । सहस्रीणीभिः । ऊतिभिः । वाजेभिः । उप । नः । हवम् ॥७४५॥

Samveda - Mantra Number : 745
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मनुष्य प्रभु को पुकारता है और यदि उसकी पुकार सुनी जाती है तो उसे सहायता भी प्राप्त होती है, परन्तु मनुष्य की पुकार सदा तो नहीं सुनी जाती । मन्त्र का 'यदि' शब्द इस भावना को सुव्यक्त कर रहा है। पुकार कब सुनी जाती है ? इस प्रश्न का उत्तर भी मन्त्र का ‘वाजेभि:' शब्द दे रहा है। ‘वज गतौ' धातु से यह शब्द बना है । गतिशीलता होने पर ही हम पुकार को सुनाने के अधिकारी बनते हैं। हम केवल प्रार्थना करें और प्रयत्न कुछ न करें तो वह प्रार्थना निष्फल ही है, अत: मन्त्र में कहते हैं कि (वाजेभिः) = क्रियाशीलता के द्वारा (नः हवम्) = हमारी पुकार को (यदि) = यदि वे प्रभु श्(रवत्) = सुनते हैं तो (सहस्त्रिणीभिः ऊतिभिः) = शतश: संरक्षणों के साथ (घ) = निश्चय से (उप आगमत्) = हमें अवश्य प्राप्त होते हैं ।

, हमारी पुकार सुनी तभी जाएगी जब हम भरपूर पुरुषार्थ करेंगे [वाजेभिः] । प्रभु (‘न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः') =  श्रम के बिना मित्रता के लिए नहीं होते । जब श्रम के उपरान्त हमारे सहायक हो जाते हैं तब वासनाओं के साथ संग्राम में हमारा पराजय नहीं होता, अपितु हम प्रभु के शतशः रक्षणों से सुरक्षित होते हैं ।
Essence
श्रमशीलता से हम प्रभु प्रार्थना के अधिकारी बनें ।
Subject
वासनाओं के शिकार न हो जाएँ