Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 744

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡नु꣢ प्र꣣त्न꣡स्यौक꣢꣯सो हु꣣वे꣡ तु꣢विप्र꣣तिं꣡ नर꣢꣯म् । यं꣢ ते꣣ पू꣡र्वं꣢ पि꣣ता꣢ हु꣣वे꣢ ॥७४४॥

अ꣣नु꣢꣯ । प्र꣣त्न꣡स्य꣢ । ओ꣡क꣢꣯सः । हु꣣वे꣢ । तु꣣विप्रति꣢म् । तु꣣वि । प्रति꣢म् । न꣡र꣢꣯म् । यम् । ते꣣ । पू꣡र्व꣢꣯म् । पि꣣ता꣢ । हु꣣वे꣢ ॥७४४॥

Mantra without Swara
अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम् । यं ते पूर्वं पिता हुवे ॥

अनु । प्रत्नस्य । ओकसः । हुवे । तुविप्रतिम् । तुवि । प्रतिम् । नरम् । यम् । ते । पूर्वम् । पिता । हुवे ॥७४४॥

Samveda - Mantra Number : 744
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस समय हम संसार में भटक रहे हैं । भटकते-भटकते बड़ी देर हो गयी है, अतः घर तो कुछ पुराना-सा हो गया है, परन्तु उस सनातन घर में पहुँचना तो है ही । (प्रत्नस्य ओकसः अनु) = उस सनातन घर का लक्ष्य करके, अर्थात् संसार - यात्रा को पूर्ण करके प्रभु की गोद में पहुँचनेरूप मोक्ष को लक्ष्य करके मैं उस प्रभु को (हुवे) = पुकारता हूँ, जो (तुविप्रतिम्) = महान् पूरण करनेवाले हैं [तुवि=महान्, प्रा= = पूरणे], (नरम्) = जो हमारा पूरण करके निरन्तर हमें आगे और आगे ले जानेवाले हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह सदा प्रभु का आह्वान करे, जिससे उसकी न्यूनताएँ दूर हों और वह आगे बढ़ सके। संसार प्रलोभनों से भरा है, हम इसमें भटक जाते हैं और भटकते ही रहते हैं, घर वापस पहुँचने का ध्यान ही नहीं रहता, अतः मनुष्य को प्रेरणा देते हैं कि हे मनुष्य ! तू उसी प्रभु को पुकार (यम्) = जिसे ते (पिता) = तुम्हारे पिता (पूर्वम्) = तुमसे पहले (हुवे) = पुकारते रहे हैं। अपनी पैतृक संस्कृति को नष्ट क्यों होने देना! पूर्वजों की उत्तम कुल-रीतियों को चलाते चलना ही ठीक है।
Essence
अपने पूर्वजों के पदचिह्नों पर चलता हुआ मैं प्रभु का स्मरण करूँ और मोक्ष को अपना लक्ष्य बनाऊँ ।
Subject
उसी को पुकारें