Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 743

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो꣡गे꣣योगे त꣣व꣡स्त꣢रं꣣ वा꣡जे꣢वाजे हवामहे । स꣡खा꣢य꣣ इ꣡न्द्र꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥७४३॥

यो꣡गेयो꣢꣯गे । यो꣡गे꣢꣯ । यो꣣गे । तव꣡स्त꣢रम् । वा꣡जे꣢꣯वाजे । वा꣡जे꣢꣯ । वा꣣जे । हवामहे । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ऊ꣣त꣡ये꣢ ॥७४३॥

Mantra without Swara
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे । सखाय इन्द्रमूतये ॥

योगेयोगे । योगे । योगे । तवस्तरम् । वाजेवाजे । वाजे । वाजे । हवामहे । सखायः । स । खायः । इन्द्रम् । ऊतये ॥७४३॥

Samveda - Mantra Number : 743
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि 'शुनः शेप आजीगर्ति' है । 'शुनम्' शब्द सुख का वाचक है, शेप का अर्थ है—बनाना [To make]। एवं, सुख का निर्माण करनेवाला व्यक्ति ‘शुन:शेप' है। जब यह सांसारिक सुख को अपना लक्ष्य बनाता है तब प्रेयमार्ग के साधनों को जुटाने के लिए अन्धाधुन्ध धन कमाता है और (आजीगर्ति) = द्यूतफलक की ओर जानेवाला होता है [अज् गतौ, गर्तम्=द्यूतफलकम्] । इसकी प्रवृत्ति सट्टे के व्यापार व जुए के भिन्न-भिन्न प्रकारों की ओर होती है, परन्तु जब यह अपने जीवन का लक्ष्य सांसारिक सुख के स्थान में ' श्रेयमार्ग' को बनाता है, तब यही शुन: शेप द्यूतफलक को परे फेंकनेवाला [अज् क्षेपणे] आजीगर्ति बन जाता है । वह प्रभु-प्राप्ति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाता है और जब कभी प्रभु का इसे आभास होता है तब यह अनुभव करता है कि (योगे-योगे) = उस उस सम्पर्क के समय (तवस्तरम्) = वे प्रभु बड़ी शक्ति देनेवाले हैं [तवस् - बल], इसलिए यह कहता है कि (वाजे-वाजे) = जब-जब काम, क्रोध, लोभ आदि से युद्ध का प्रसंग आता है [to wage a war] वज गतौ=to attack तब-तब हे प्रभो! हम आपको ही (हवामहे) = पुकारते हैं

परन्तु हमें आपको पुकारने का अधिकार भी तो तभी प्राप्त होता है, जब (सखायः) = हम आपके समान ख्यानवाले बनते हैं । आप सर्वज्ञ हैं, हम भी तीव्र तपस्या के द्वारा सर्वज्ञकल्प बनने का प्रयत्न करें। जब जीव इस प्रकार अपने ज्ञान को बढ़ाता है तभी इन्द्र का सखा कहलाने का अधिकारी होता है। यह प्रभु से कहता है कि (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली, सब असुरों का संहार करनेवाले आपको (ऊतये) = अपनी रक्षा के लिए पुकारता हूँ । इन कामादि के साथ युद्ध में मेरी विजय आपके बिना असम्भव है। आपके सहाय से ही मैं इनको जीत पाऊँगा, नहीं तो यह काम तो 'मार' है – यह तो मुझे मार ही डालेगा। आप ही कामारि हैं, आप ही मुझे इससे बचाएँगे।
Essence
प्रभु के सौन्दर्य से मैं अपने को शक्तिशाली बनाऊँ और काम पर विजय पाऊँ ।
Subject
प्रत्येक युद्ध के समय