Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 738

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢स्ते꣣ अ꣡नु꣢ स्व꣣धा꣡मस꣢꣯त्सु꣣ते꣡ नि य꣢꣯च्छ त꣣꣬न्व꣢꣯म् । स꣡ त्वा꣢ ममत्तु सोम्य ॥७३८॥

यः꣢ । ते꣣ । अ꣡नु꣢꣯ । स्व꣣धा꣢म् । स्व꣡ । धा꣢म् । अ꣡स꣢꣯त् । सु꣣ते꣢ । नि । य꣣च्छ । त꣢꣯न्व꣢म् । सः । त्वा꣣ । ममत्तु । सोम्य ॥७३८॥

Mantra without Swara
यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम् । स त्वा ममत्तु सोम्य ॥

यः । ते । अनु । स्वधाम् । स्व । धाम् । असत् । सुते । नि । यच्छ । तन्वम् । सः । त्वा । ममत्तु । सोम्य ॥७३८॥

Samveda - Mantra Number : 738
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु कहते हैं कि हे (सोम्य) = विनीत ! सोम की रक्षा द्वारा तूने नम्रता प्राप्त की है । तू सुते इस उत्पन्न जगत् में सोम का (तन्वम्) = [तन्वाम्] शरीर में (नियच्छ) = नियमन व रक्षा कर (यः) = जो (ते) = तेरे (स्वाधाम् अनु असत्) = अपने धारण के अनुपात में है, अर्थात् जितना- जितना तू सोम का नियमन करेगा, उतना-उतना अपने जीवन का धारण करनेवाला बनेगा। (स त्वा ममत्तु) = यह सोम तुझे मदयुक्त करे । तेरे जीवन में एक मस्ती हो । निराशा व दुःख तुझे कभी न घेरें । बड़े-से-बड़े कष्ट में भी तू प्रसन्न ही हो, परन्तु ऐसा होना तो उस वीर्य की रक्षा पर ही निर्भर है । तुझे मदयुक्त करके भी यह सोम (सोम्य) = विनीत बनाये रखता है । यही तो इसकी विशेषता है कि मद और अमद इसमें साथसाथ रहते हैं। प्रभु को भी 'मदामद' इस नाम से स्मरण किया गया है, यह सोम जीव को भी 'मदामद' बना प्रभु-जैसा बना देता है।
Essence
सोम की रक्षा के द्वारा मेरे जीवन में 'स्वधा' = स्वधारणशक्ति हो, मद हो तथा मद के साथ विनीतता हो ।
Subject
स्वधा, मद, सौम्यता