Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 737

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣द꣡ꣳ ह्यन्वोज꣢꣯सा सु꣣त꣡ꣳ रा꣢धानां पते । पि꣢बा꣣ त्वा꣢३स्य꣡ गि꣢र्वणः ॥७३७॥

इ꣣द꣢म् । हि । अ꣡नु꣢꣯ । ओ꣡ज꣢꣯सा । सु꣣त꣢म् । रा꣣धानाम् । पते । पि꣡ब꣢꣯ । तु । अ꣣स्य꣢ । गि꣣र्व꣡णः । गिः । वनः ॥७३७॥

Mantra without Swara
इदꣳ ह्यन्वोजसा सुतꣳ राधानां पते । पिबा त्वा३स्य गिर्वणः ॥

इदम् । हि । अनु । ओजसा । सुतम् । राधानाम् । पते । पिब । तु । अस्य । गिर्वणः । गिः । वनः ॥७३७॥

Samveda - Mantra Number : 737
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु कहते हैं कि (इदम्) = यह सोम [वीर्य-शक्ति] (हि) = निश्चय से (ओजसा) = ओज के दृष्टिकोण

से (अनुसुतम्) = रस-रुधिरादि के क्रम से तेरे शरीर में उत्पन्न की गयी है। (राधानां पते) = हे सफलताओं के स्वामिन्! [राध्=-सिद्धि] (पिब तु अस्य) = निश्चय से तू इसका पान कर। इसका पान ही तुझे संसार में सफल बनाएगा । जीव को 'राधानां पते' शब्द से सम्बोधन करना उसे प्रेरणा देने के लिए है कि तूने सफल बनना है। इसे सफल बनाने का साधन सोम का पान है।

सोम के पान के लिए साधना का संकेत 'गिर्वणः' शब्द में है । 'गिर्वणः' का अर्थ है कि गिराओं से—वेद-वाणियों से अथवा गिरा से - वाणी से प्रभु का सम्भजन करनेवाला । प्रभु के नाम का जप मनुष्य के मन को विषयों की प्रवृत्ति से रोकता - बचाता है और इस प्रकार उसे सोम-पान के योग्य बनाता है ।

एवं, सोमपान का साधन तो प्रभु के नाम का जप व वेदवाणियों का सेवन है और इसका साध्य 'सफलता' है।
Essence
मैं प्रभु के नाम के जप व वेदवाणियों के सेवन द्वारा सोम-पान करता हुआ सदा राधा=सिद्धि का पति बनँञ ।
Subject
राधा-पति