Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 734

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣द꣡म् व꣢सो सु꣣त꣢꣫मन्धः꣣ पि꣢बा꣣ सु꣡पू꣢र्णमु꣣द꣡र꣢म् । अ꣡ना꣢भयिन्ररि꣣मा꣡ ते꣢ ॥७३४॥

इ꣣द꣢म् । वसो । सुत꣢म् । अ꣡न्धः꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ । सु꣡पू꣢꣯र्णम् । सु । पू꣣र्णम् । उद꣡र꣢म् । उ꣣ । द꣡र꣢꣯म् । अ꣡ना꣢꣯भयिन् । अन् । आ꣣भयिन् । ररिम꣢ । ते꣣ ॥७३४॥

Mantra without Swara
इदम् वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन्ररिमा ते ॥

इदम् । वसो । सुतम् । अन्धः । पिब । सुपूर्णम् । सु । पूर्णम् । उदरम् । उ । दरम् । अनाभयिन् । अन् । आभयिन् । ररिम । ते ॥७३४॥

Samveda - Mantra Number : 734
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रियमेध ऋषि से प्रभु कहते हैं कि हे (वसो) = उत्तम निवास करने के लिए प्रयत्नशील जीव ! (इदम्) = यह (अन्धः) = आध्यायनीय – सर्वथा ध्यान देने योग्य वीर्य-शक्ति [सोम] (सुतम्) = मैंने तुझमें पैदा कर दी है। (पिब) = तू इसका पान कर, इसे अपने अन्दर ही व्याप्त करने के लिए प्रयत्न कर। पी हुई यह शक्ति (सुपूर्णम्) = उत्तम प्रकार से तेरा पालन व पूरण करनेवाली होगी । तेरे शरीर पर रोगों का आक्रमण न होगा, मन में ईर्ष्या-द्वेष उत्पन्न न होंगे तथा बुद्धि में कुण्ठता न आएगी । तेरा पूरण तो करेगी ही (उत) = और (अरम्) = वह तेरे जीवन को अलंकृत कर देगी । वीर्य शरीर को शक्ति सम्पन्न करता है, मन को निर्मल व बुद्धि को तीव्र । एवं, यह शरीर, मन व बुद्धि तीनों को ही शोभान्वित करता है। इसके अतिरिक्त इस वीर्य-रक्षा का सबसे महान् लाभ तो यह है कि मनुष्य निर्भीक बनता है। प्रभु कहते हैं कि (अनाभयिन्) = हे निर्भीक प्रियमेध! ते (ररिम) = तुझे हम सर्वोत्तम भेंट प्राप्त कराते हैं। प्रभु की जीव के प्रति अनन्त देनों में यह सर्वोत्तम देन है। इसी पर अन्य सारी उन्नति निर्भर है 
Essence
सुरक्षित वीर्य हमारा पालन व पूरण करता है, यह हमारे जीवन को अलंकृत करता | है और हमें निर्भीक बनाता है ।
 
Subject
प्रभु का उपहार