Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 730

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुसीदी काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡ हि त्वा꣢꣯ शूर दे꣣वा꣡ न मर्ता꣢꣯सो꣣ दि꣡त्स꣢न्तम् । भी꣣मं꣢꣫ न गां वा꣣र꣡य꣢न्ते ॥७३०॥

न । हि । त्वा꣣ । शूर । देवाः꣢ । न । म꣡र्ता꣢꣯सः । दि꣡त्स꣢꣯न्तम् । भी꣣म꣢म् । न । गाम् । वा꣣र꣡य꣢न्ते ॥७३०॥

Mantra without Swara
न हि त्वा शूर देवा न मर्तासो दित्सन्तम् । भीमं न गां वारयन्ते ॥

न । हि । त्वा । शूर । देवाः । न । मर्तासः । दित्सन्तम् । भीमम् । न । गाम् । वारयन्ते ॥७३०॥

Samveda - Mantra Number : 730
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मनुष्य ज्ञान प्राप्त करके दक्षिणेन-कुशलता से कर्म करने लगता है और अवोभिः=वासनाओं से अपनी रक्षा कर पाता है। पिछले मन्त्र में (‘तुविकूर्मिम् व तुविदेष्णम्') = शब्दों से खूब क्रियाशीलता व खूब देने की वृत्ति का संकेत किया था। उसी का संकेत करते हुए रक्षण की इच्छावाले जीव से प्रभु कहते हैं कि (दित्सन्तम्) = देने की इच्छावाले (त्वा) = तुझे हे (शूर) = सब अशुभ भावनाओं को नष्ट करनेवाले जीव ! (न हि) = न तो (देवः) = अन्तरिक्षलोक (न मर्तासः) = न यह पृथिवीलोक (वारयन्ते) = आच्छादित कर पाते हैं, अर्थात् कोई भी वासना आकाश-पाताल का ज़ोर लगाकर भी तुझे वशीभूत नहीं कर सकती । (भीमं गाम्) = भयङ्कर साँड को क्या कोई पशु वशीभूत कर पाता है ? (न) = उसी प्रकार तू भी देने की इच्छावाला बनकर किसी वासना से वशीभूत नहीं किया जा सकता ।

दान [दा=देना] मनुष्य की सब अशुभ भावनाओं को नष्ट करता है [दा-काटना] और उसके जीवन को शुद्ध बनाता [दा=शोधन] है। लोभ ही तो सब वासनाओं का मूल है । लोभ गया तो वासनाएँ गई। मूल कटा तो वृक्ष कहाँ बचा? दाता तो वासनाओं के लिए भयङ्कर साँड के समान हो जाता है। उसके सामने वासनाएँ ठहर ही कहाँ सकती हैं ? 
Essence
हममें दानवृत्ति सदा पनपे और वासनाएँ विनष्ट हों ।
Subject
देने की इच्छावाला