Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 73

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- बुधगविष्टिरावात्रेयौ Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡बो꣢ध्य꣣ग्निः꣢ स꣣मि꣢धा꣣ ज꣡ना꣢नां꣣ प्र꣡ति꣢ धे꣣नु꣡मि꣢वाय꣣ती꣢मु꣣षा꣡स꣢म् । य꣣ह्वा꣡ इ꣢व꣣ प्र꣢ व꣣या꣢मु꣣ज्जि꣡हा꣢नाः꣣ प्र꣢ भा꣣न꣡वः꣢ सस्रते꣣ ना꣢क꣣म꣡च्छ꣢ ॥७३॥

अ꣡बो꣢꣯धि । अ꣣ग्निः꣢ । स꣣मि꣡धा꣢ । स꣣म् । इ꣡धा꣢꣯ । ज꣡ना꣢꣯नाम् । प्र꣡ति꣢꣯ । धे꣣नु꣢म् । इ꣣व । आयती꣢म् । आ꣣ । यती꣢म् । उ꣣षा꣡स꣢म् । य꣣ह्वाः꣢ । इ꣣व । प्र꣢ । व꣣या꣢म् । उ꣣ज्जि꣡हा꣢नाः । उ꣣त् । जि꣡हा꣢꣯नाः । प्र । भा꣣न꣡वः꣢ । स꣣स्रते । ना꣡क꣢꣯म् । अ꣡च्छ꣢꣯ ॥७३॥

Mantra without Swara
अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम् । यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ ॥

अबोधि । अग्निः । समिधा । सम् । इधा । जनानाम् । प्रति । धेनुम् । इव । आयतीम् । आ । यतीम् । उषासम् । यह्वाः । इव । प्र । वयाम् । उज्जिहानाः । उत् । जिहानाः । प्र । भानवः । सस्रते । नाकम् । अच्छ ॥७३॥

Samveda - Mantra Number : 73
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(प्रथम आश्रम) - मानव जीवन चार आश्रमों में विभक्त है। प्रथम आश्रम में आचार्य, जोकि स्वयं अग्नि के तुल्य ज्ञान से चमक रहा है, पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक के पदार्थों की ज्ञानरूप समिधाओं से ब्रह्मचारी की ज्ञानाग्नि को दीप्त करता है। अथर्ववेद के ब्रह्मचर्यसूक्त में इन समिधाओं का संकेत है, अतः (समिधा) = इन लोकों की ज्ञानरूप समिधाओं से ब्रह्मचारी (अग्निः) = अग्नि के रूप में (अबोधि) = उद्बुद्ध किया जाता है।

इस मन्त्र के ऋषि 'बुध तथा गविष्ठिर' हैं। बुध का अर्थ है ज्ञानी । आचार्य को ज्ञानी व ज्ञान का समुद्र होना ही चाहिए तथा ब्रह्मचारी को गविष्ठिर- इन्द्रियों पर अधिष्ठित, इन्हें वश में रखनेवाला होना आवश्यक है तभी अग्नि का उद्बोधन सम्भव होगा।

(गृहस्थ आश्रम) = यह उत्तम ब्रह्मचारी समावृत होकर जीवन यात्रा के दूसरे पड़ाव में प्रवेश करता है। यहाँ उसे (प्रति-आय-तीम् उषासम्)=प्रत्येक आनेवाले उषःकाल में (जनानाम्) = मनुष्यों की (धेनुमिव) = गाय की भाँति औरों का पालन करना है। जैसे अपने उत्तम दूध से गाय अपने बछड़े व अन्य बन्धुओं का पालन करती है, वैसे ही गृहस्थ भी अपनी सन्तान व अन्य तीनों आश्रमवालों का पालन करता है। इसी उत्तरदायित्त्व के कारण गृहस्थ को ज्येष्ठाश्रमी कहा गया है।

यहाँ धेनु से समता कितनी सुन्दर है ! गृहस्थ को भी स्वयं अपनी आवश्यकताएँ यथासम्भव कम रखकर औरों का पालन करना चाहिए।

(वानप्रस्थ आश्रम) = गृहस्थ आश्रम महान् है, पर मनुष्य को सदा इसी में नहीं बने रहना। वेद कहता है कि (यह्वा:) = बड़े (इव) = पक्षी जैसे (वयाम्) = शाखा को प्र (उयिहाना:) = छोड़कर आगे बढ़नेवाले होते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी बड़ी अवस्था में पहुँचकर घर को छोड़कर आगे बढ़ना ही चाहिए। उसे अब वनस्थ हो ('स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्') = सदा स्वाध्याय में लगे रहना चाहिए।

(चतुर्थ आश्रम) = और फिर (भानवः) = ज्ञान - ज्योति से दीप्त सूर्य के समान ये संन्यासी (नाकम् अच्छ) = मोक्ष की ओर (प्रसस्ते) = अग्रसर होते हैं। लोकहित के लिए सूर्य के समान अलिप्तभाव से अज्ञानान्धकार को दूर करते हुए ये संन्यासी राग-द्वेषादि सब बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।
Essence
मनुष्य को क्रमश: ‘अग्नि, धेनु, यह्व व भानु' बनकर जीवन के चार पड़ावों को उत्तमता से तय करने के लिए यत्नशील होना चाहिए।
Subject
चार आश्रम