Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 728

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुसीदी काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ तू न꣢꣯ इन्द्र क्षु꣣म꣡न्तं꣢ चि꣣त्रं꣢ ग्रा꣣भ꣡ꣳ सं गृ꣢꣯भाय । म꣣हाहस्ती꣡ दक्षि꣢꣯णेन ॥७२८॥

आ꣢ । तु । नः꣣ । इन्द्र । क्षुम꣡न्त꣢म् । चि꣣त्र꣢म् । ग्रा꣣भ꣢म् । सम् । गृ꣣भाय । महाहस्ती꣢ । म꣣हा । हस्ती꣢ । द꣡क्षि꣢꣯णेन ॥७२८॥

Mantra without Swara
आ तू न इन्द्र क्षुमन्तं चित्रं ग्राभꣳ सं गृभाय । महाहस्ती दक्षिणेन ॥

आ । तु । नः । इन्द्र । क्षुमन्तम् । चित्रम् । ग्राभम् । सम् । गृभाय । महाहस्ती । महा । हस्ती । दक्षिणेन ॥७२८॥

Samveda - Mantra Number : 728
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु से आलिङ्गन करनेवाला, अतएव मेधावी ‘कुसीदी काण्व' [कुस् संश्लेषणे] प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (महाहस्ती तु) = आप तो महान् ज्ञानवाले हैं । [हन्=गति= ज्ञान]। (नः) = हमें भी आ सब प्रकार से (क्षुमन्तम्) = शब्दमय (चित्रम्) = ज्ञान देनेवाली (ग्राभम्) = सम्पत्ति Possession=को (संगृभाय) = सम्यक् प्राप्त कराइए, हम सब कार्यों को (दक्षिणेन) = [हेतौ तृतीया] = दाक्षिण्य से करनेवाले बनें । ज्ञानी बनकर ही हम वह कौशल प्राप्त कर सकेंगे, जिससे कि कर्म करते हुए भी हम कर्म में फँसेंगे नहीं।(‘योगः कर्मसु कौशलम्') = हम योगी बनकर कर्म कर पाएँगे । 
 
Essence
 ज्ञान प्राप्त कर हम कर्मों को कुशलता से करनेवाले बनें ।
Subject
वाङ्मय सम्पत्ति