Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 723

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢स्मि꣣न्वि꣢श्वा꣣ अ꣢धि꣣ श्रि꣢यो꣣ र꣡ण꣢न्ति स꣣प्त꣢ स꣣ꣳस꣡दः꣢ । इ꣡न्द्र꣢ꣳ सु꣣ते꣡ ह꣢वामहे ॥७२३॥

य꣡स्मि꣢꣯न् । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣡धि꣢꣯ । श्रि꣡यः꣢꣯ । र꣡ण꣢꣯न्ति । स꣣प्त꣢ । स꣣ꣳस꣡दः꣢ । स꣣म् । स꣡दः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । सु꣡ते꣢ । ह꣣वामहे ॥७२३॥

Mantra without Swara
यस्मिन्विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त सꣳसदः । इन्द्रꣳ सुते हवामहे ॥

यस्मिन् । विश्वा । अधि । श्रियः । रणन्ति । सप्त । सꣳसदः । सम् । सदः । इन्द्रम् । सुते । हवामहे ॥७२३॥

Samveda - Mantra Number : 723
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रम्) = परमैश्वर्यवाले प्रभु को (सुते) = उन्नति [प्रसव=growth] अभ्युदय व परमैश्वर्य=निःश्रेयस के लिए ['सुते' में निमित्त सप्तमी है] (हवामहे) = पुकारते हैं। उस इन्द्र को (यस्मिन् अधि) = जिसमें (विश्वाः श्रियः) = संसार की सब लक्ष्मियाँ निवास करती हैं तथा (संसदः) = वासनाओं का सम्यक् विनाश करनेवाले [षद् = अवसादन, to kill] (सप्त) = सात छन्द व छन्दोरूप मन्त्र (रणन्ति) = शब्द करते व रममाण होते हैं ।

उल्लिखित शब्दार्थ से यह सुव्यक्त है कि प्रभु की उपासना इसलिए करो कि वे प्रभु ही लक्ष्मी व सरस्वती का अधिष्ठान हैं। प्रभु की उपासना से सांसारिक ऐश्वर्य भी मिलेगा तथा ज्ञानरूप परमैश्वर्य भी प्राप्त होगा । एवं, उपासना अभ्युदय व निः श्रेयस दोनों को सिद्ध करती है, इससे ऐहलौकिक ऐश्वर्य भी प्राप्त होता है और पारलौकिक कल्याण भी सिद्ध होता है ।
Essence
हम प्रभु के उपासक बनें, क्योंकि सारा धन व सारा ज्ञान उसी में निहित है।
Subject
सारा धन, सारा ज्ञान