Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 719

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
व꣣य꣡मु꣢ त्वा त꣣दि꣡द꣢र्था꣣ इ꣡न्द्र꣢ त्वा꣣य꣢न्तः꣣ स꣡खा꣢यः । क꣡ण्वा꣢ उ꣣क्थे꣡भि꣢र्जरन्ते ॥७१९॥

व꣣य꣢म् । उ꣣ । त्वा । तदि꣡द꣢र्थाः । त꣣दि꣢त् । अर्थाः । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वा꣣य꣡न्तः꣢ । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । क꣡ण्वाः꣢꣯ । उ꣣क्थे꣡भिः꣢ । ज꣣रन्ते ॥७१९॥

Mantra without Swara
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः । कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते ॥

वयम् । उ । त्वा । तदिदर्थाः । तदित् । अर्थाः । इन्द्र । त्वायन्तः । सखायः । स । खायः । कण्वाः । उक्थेभिः । जरन्ते ॥७१९॥

Samveda - Mantra Number : 719
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र के ऋषि मेध्यातिथि व प्रियमेध हैं । (मेध्यः) = पवित्र प्रभु ही है अतिथि जिसका, वह ‘मेध्यातिथि' है । (तदिदर्थाः) = वह प्रभु ही उसका एकमात्र प्रयोजन होता है। (त्वायन्तः) = वह उस प्रभु की ही ओर चलता है, उसी का सखा बनता है । वह स्पष्ट कहता है कि (वयम्) = हम (त्वा) = तुझे ही चाहते हैं। वस्तुत: जिन्हें मेधा प्रिय है, वे (कण्वाः) = मेधावी पुरुष (उक्थेभिः) = स्तोत्रों से प्रभु की ही तो (जरन्ते) = स्तुति करेंगे । अन्य सांसारिक वस्तुएँ अन्यत्र मिल भी जाएँ, परन्तु मेधा तो प्रभु की उपासना से ही प्राप्त होगी, अतः यह ज्ञानी प्रभु का ही भक्त बनता है ।
Essence
मेधावी तेरी ही कामना करते हैं ।
Subject
'मेध्यातिथि प्रियमेध' की उपासना
Footnote
इस मन्त्र का व्याख्यान मन्त्र संख्या १५७ पर हो चुका है, अतः यहाँ संक्षेप से ही दिया है ।