Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 718

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं꣡ न इ꣢न्द्र वाज꣣यु꣢꣫स्त्वं ग꣣व्युः꣡ श꣢तक्रतो । त्व꣡ꣳ हि꣢रण्य꣣यु꣡र्व꣢सो ॥७१८॥

त्व꣢म् । नः꣣ । इन्द्रः । वाजयुः꣢ । त्वम् । ग꣣व्युः꣢ । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । त्व꣢म् । हि꣣रण्ययुः꣢ । व꣣सो ॥७१८॥

Mantra without Swara
त्वं न इन्द्र वाजयुस्त्वं गव्युः शतक्रतो । त्वꣳ हिरण्ययुर्वसो ॥

त्वम् । नः । इन्द्रः । वाजयुः । त्वम् । गव्युः । शतक्रतो । शत । क्रतो । त्वम् । हिरण्ययुः । वसो ॥७१८॥

Samveda - Mantra Number : 718
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हम उस प्रभु का स्तवन करें, क्योंकि वे प्रभु इन्द्र हैं, सर्वशक्तिमान् हैं। हमारा सम्बन्ध इस इन्द्र से होगा तो उसकी शक्ति हमें भी शक्ति-सम्पन्न बनानेवाली होगी । (इन्द्र) = हे शक्ति-पुञ्ज प्रभो ! (त्वम्) = आप (नः)=हमें (वाजयुः) = शक्ति के साथ जोड़नेवाले हैं [वाज = बल, यु=जोड़ना] । आचार्य दयानन्द के शब्दों में उपासना से मनुष्य चट्टान की भाँति दृढ़ बन जाता है [As firm as a rock] और बड़ीसे-बड़ी आपत्ति भी उसे व्याकुल नहीं कर पाती । आओ, हम उस प्रभु का स्तवन करें- हे (शतक्रतो) = अनन्तप्रज्ञानोंवाले परमात्मन् ! (त्वम्) = आप (गव्युः) = [गो+युः] वेदवाणी का हमारे साथ सम्पर्क करनेवाले हैं। प्रभु की उपासना से ही तो वेदार्थ का प्रतिभास होता है। हे (वसो) = सबको बसानेवाले प्रभो ! आप (हिरण्ययुः) = हितरमणीय वीर्यशक्ति को हमारे शरीर में बाँधनेवाले हैं। 
Essence
प्रभु-स्तवन से हम भी इन्द्र, शतक्रतु व वसु बनें। 
Subject
शतक्रतु और वसु इन्द्र,