Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 716

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य꣣ मा꣡द꣢न꣣ꣳ ह꣡र्य꣢श्वाय गायत । स꣡खा꣢यः सोम꣣पा꣡व्ने꣢ ॥७१६॥

प्र꣢ । वः꣣ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । मा꣡द꣢꣯नम् । ह꣡र्य꣢꣯श्वाय । ह꣡रि꣢꣯ । अ꣣श्वाय । गायत । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣡यः । सोमपा꣡व्ने꣢ । सो꣣म । पा꣡व्ने꣢꣯ ॥७१६॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय मादनꣳ हर्यश्वाय गायत । सखायः सोमपाव्ने ॥

प्र । वः । इन्द्राय । मादनम् । हर्यश्वाय । हरि । अश्वाय । गायत । सखायः । स । खायः । सोमपाव्ने । सोम । पाव्ने ॥७१६॥

Samveda - Mantra Number : 716
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘मैत्रावरुणि वसिष्ठ', अर्थात् प्राणापानों की साधना से इन्द्रियों को वश में करनेवालों में श्रेष्ठ यह ऋषि अपने मित्रों को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे (सखायः) = ज्ञानहैतुक मैत्रीवालो ! प्रभु के लिए (प्रगायत) = खूब गायन करो । किस प्रभु के लिए ?

१. (इन्द्राय) = परमैश्वर्यवाले प्रभु के लिए । ज्ञानरूप परमैश्वर्य प्रभु ही तो प्राप्त कराएँगे। २. (हर्यश्वाय) = इन्द्रियों को आकृष्ट करनेवाले के लिए [अश्व= इन्द्रियाँ, हरि - हरण करना] यदि इन्द्रियाँ कभी स्थिर होंगी तो उस प्रभु में ही । अन्य सांसारिक वस्तुओं से तो वे कुछ देर पश्चात् ही ऊब जाती हैं । ३. (सोमपाने) = सोम की रक्षा करनेवाले के लिए। यह प्रभु-स्तवन हमें भोगासक्ति से दूर कर शक्ति-रक्षा में समर्थ बनाएगा। ४. (वः मादनम्) = यह प्रभु-स्तवन तुम्हें आनन्दित करनेवाला होगा। वह आनन्द तो अवर्णनीय होता है। [न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा] ।
Essence
हम प्रभु-स्तवन करके जीवन में उत्कृष्ट मस्ती का अनुभव करें ।
Subject
वसिष्ठ का स्तवन