Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 710

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- ककुबुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣢धा꣣꣬ ही꣢꣯न्द्र गिर्वण꣣ उ꣡प꣢ त्वा꣣ का꣡म꣢ ई꣣म꣡हे꣢ ससृ꣣ग्म꣡हे꣢ । उ꣣दे꣢व꣣ ग्म꣡न्त꣢ उ꣣द꣡भिः꣢ ॥७१०॥

अ꣡ध꣢꣯ । हि । इ꣣न्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । का꣡मे꣢꣯ । ई꣣म꣡हे꣢ । स꣣सृग्म꣡हे꣢ । उ꣣दा꣢ । इ꣣व । ग्म꣡न्तः꣢꣯ । उ꣣द꣡भिः꣢ ॥७१०॥

Mantra without Swara
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा काम ईमहे ससृग्महे । उदेव ग्मन्त उदभिः ॥

अध । हि । इन्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । उप । त्वा । कामे । ईमहे । ससृग्महे । उदा । इव । ग्मन्तः । उदभिः ॥७१०॥

Samveda - Mantra Number : 710
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में प्रभु को ‘सानसिम्' शब्द से स्मरण किया था। इस संविभाग की वृत्तिवाला मनुष्य 'नृमेध' मनुष्यों के साथ मिलकर चलनेवाला होता है । इस यज्ञिय वृत्ति के कारण यह वासनाओं में फँसता नहीं और यह वासनाओं का शिकार न होना ही इसके ‘आङ्गिरस' बनने का रहस्य हो जाता है। यह अङ्ग-अङ्ग में रसवाला, शक्तिशाली होता है । वह प्रभु से दूर होने के कटु अनुभव के बाद कहता है कि (अध) = अब (हि) = निश्चय से (इन्द्र) = हे परमेश्वर्यशाली प्रभो ! हे (गिर्वणः) = वेदवाणियों से स्तुति के योग्य प्रभो ! (कामे) = जब कभी वासना के आक्रमण का प्रसङ्ग होता है तब हम (त्वा) = आपको ही (उप ईमहे) = समीप चाहते हैं, (इव) = जैसेकि (उदभिः उदा ग्मन्त) = पानियों से पानी मिल जाते हैं। इस प्रकार आपके साथ एक होकर ही तो हम वासनाओं के आक्रमण से बच पाते हैं। बच्चा अपने को माता की गोद में छिपा देता है और सुरक्षित हो जाता है। हम भी अपने को आपमें छिपा देते हैं और इन वासनाओं से बच जाते हैं। सारे वेद प्रभु की महिमा का बखान इसीलिए तो कर रहे हैं। क्या प्रभुकृपा के बिना कभी इस माया को तैरना सम्भव हो सकता है ? प्रभु की शरण में जाकर ही हम इसे तैरेंगे। 
Essence
हम प्रभु से अपने को एक कर दें और माया को तैर जाएँ ।
Subject
जैसे पानी पानी के साथ