Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 706

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢त्र꣣꣬ क्व꣢꣯ च ते꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्षं꣢ दधस꣣ उ꣡त्त꣢रम् । त꣢त्र꣣ यो꣡निं꣢ कृणवसे ॥७०६॥

य꣡त्र꣢꣯ । क्व꣢ । च꣣ । ते । म꣡नः꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । द꣣धसे । उ꣡त्त꣢꣯रम् । त꣡त्र꣢꣯ । यो꣡नि꣢꣯म् । कृ꣣णवसे ॥७०६॥

Mantra without Swara
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम् । तत्र योनिं कृणवसे ॥

यत्र । क्व । च । ते । मनः । दक्षम् । दधसे । उत्तरम् । तत्र । योनिम् । कृणवसे ॥७०६॥

Samveda - Mantra Number : 706
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु जीव से कहते हैं कि (यत्र क्व च) =  जहाँ कहीं भी (ते मन:) = तेरा मन होता है, अर्थात् जो भी भावना तेरे अन्दर प्रयाणकाल में प्रबल होती है (तत्र) = वहाँ ही, उसके अनुसार ही तू (योनिम्) = अपने जन्म-स्थान को (कृणवसे) = करता है – बनता है । यह एक सामान्य सिद्धान्त है कि मनुष्य अपने इस जीवन में जिन भी भावनाओं से भरा रहता है, अन्त में उसी का उसे स्मरण होता है और तदनुसार ही वह अगला जीवन प्राप्त करता है । अन्त में प्रभु का स्मरण करता है, तो प्रभु को पाता है । अन्त में प्रभु का ही स्मरण हो इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन को सदा प्रभु की भावना से ओत-प्रोत करें। एवं, प्रभु कहते हैं 'जहाँ भी तेरा मन होता है, वहीं तू जन्म पाता है और उस उस जीवन में उन्नति के लिए उत्तरम् (दक्षम् दधसे) = उत्कृष्ट बल को धारण करता है।'' दक्षम्' उस बल व शक्ति को कहते हैं जो वृद्धि व उन्नति का कारण होता है ।

हमें अपनी भावना के अनुसार ही योनि व शक्ति प्राप्त होती है, अतः हम अपने जीवन को सदा उत्कृष्ट भावनाओं से भरें, जिससे अन्त में उसी भावना से ओत-प्रोत हुए हुए यहाँ से जाएँ और उत्कृष्ट जन्म का लाभ करें ।
Essence
हम प्रणव का जप करते हुए प्राणों को छोड़ने की तैयारी करें, जिससे इस जन्म के अन्त में प्रभु की गोद में पहुँच सकें।
Subject
जो अन्त मता, सो गता