Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 705

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣢ह्यू꣣ षु꣡ ब्रवा꣢꣯णि꣣ ते꣡ऽग्न꣢ इ꣣त्थे꣡त꣢रा꣣ गि꣡रः꣢ । ए꣣भि꣡र्व꣢र्धास꣣ इ꣡न्दु꣢भिः ॥७०५॥

आ꣢ । इ꣣हि । ऊ । सु꣢ । ब्र꣡वा꣢꣯णि । ते꣣ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । इ꣣त्था꣢ । इ꣡त꣢꣯राः । गि꣡रः꣢꣯ । ए꣣भिः꣢ । व꣣र्द्धासे । इ꣡न्दु꣢꣯भिः ॥७०५॥

Mantra without Swara
एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः । एभिर्वर्धास इन्दुभिः ॥

आ । इहि । ऊ । सु । ब्रवाणि । ते । अग्ने । इत्था । इतराः । गिरः । एभिः । वर्द्धासे । इन्दुभिः ॥७०५॥

Samveda - Mantra Number : 705
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि ‘साकमश्वः' है। इसका अर्थ है 'साकम् अश्वाः यस्य'=साथ हैं घोड़े जिसके, अर्थात् जिसके इन्द्रियरूप घोड़े इधर-उधर विषयों में भटक नहीं रहे । इन्द्रियग्राम को संयम करके जो समाहित चित्तवृत्तिवाला बना है वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे अने-आगे लेचलनेवाले प्रभो! (एहि) = आइए (ते) = आपके सम्पर्क में (इतरा गिरः) = सामान्य वाणियों को भी (इत्था) = सत्यरूप में (सु ब्रवाणि) = उत्तम प्रकार से बोलूँ, उपहास में भी मैं असत्य न बोलूँ। (एभिः) = ऐसे दृढ़ सत्यव्रती (इन्दुभिः) = शक्तिशाली पुरुषों से ही (वर्धासे) = हे प्रभो! आपकी महिमा बढ़ती है, उपहास में भी असत्य न बोलनेवाले इन व्यक्तियों की वाणी में इतना बल आ जाता है कि (‘वाचमर्थोऽनुवर्त्तते') = इनकी वाणी के पीछे अर्थ चलता है। (‘सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्') = सत्य में प्रतिष्ठित होने पर इनकी सब क्रियाएँ सफल होती हैं । ये जो कहते हैं वही हो जाता है । इनमें प्रभु की शक्ति कार्य करती प्रतीत होती है और इस प्रकार इनके जीवन कार्यों से प्रभु की महिमा फैलती है । 
Essence
हम उपहास में भी असत्य न बोलें।
Subject
प्रभु का यश फैलानेवाले