Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 704

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऊ꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣ꣳ स꣢ हि꣣ना꣡यम꣢꣯स्म꣣यु꣡र्दाशे꣢꣯म ह꣣व्य꣡दा꣢तये । भु꣢व꣣द्वा꣡जे꣢ष्ववि꣣ता꣡ भुव꣢꣯द्वृ꣣ध꣢ उ꣣त꣢ त्रा꣣ता꣢ त꣣नू꣡ना꣢म् ॥७०४॥

ऊ꣡र्जः꣢ । न꣡पा꣢꣯तम् । सः । हि꣣न꣢ । अ꣣य꣢म् । अ꣣स्म꣢युः । दा꣡शे꣢꣯म । ह꣣व्य꣢꣯दातये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये । भु꣡व꣢꣯त् । वा꣡जे꣢꣯षु । अ꣣वि꣢ता । भु꣡व꣢꣯त् । वृ꣣धे꣢ । उ꣣त꣢ । त्रा꣣ता꣢ । त꣣नू꣡ना꣢म् ॥७०४॥

Mantra without Swara
ऊर्जो नपातꣳ स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये । भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम् ॥

ऊर्जः । नपातम् । सः । हिन । अयम् । अस्मयुः । दाशेम । हव्यदातये । हव्य । दातये । भुवत् । वाजेषु । अविता । भुवत् । वृधे । उत । त्राता । तनूनाम् ॥७०४॥

Samveda - Mantra Number : 704
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र में शंयु कहता है कि (हव्यदातये) = सब उत्तम पदार्थों के देनेवाले उस प्रभु के लिए (दाशेम) = हम अपने को दे डालें— उसके प्रति अपना समर्पण कर दें। वे प्रभु (ऊर्ज: न पातम्) = शक्ति को कभी नष्ट न होने देनेवाले हैं। प्रभु के प्रति अपना अर्पण करने से हमारी शक्ति सदा बनी रहेगी। (सः हि) = वे प्रभु निश्चय से (नायम्) = [नी प्रापणे] हमें आगे ले जानेवाले हैं। प्रभु के प्रति अपना पूर्ण अर्पण करके यह प्रभु कृपा से आगे और आगे बढ़ता चलता है ।

(अस्मयुः) = वे प्रभु हमें चाहते हैं - हमारे साथ प्रेम रखते हैं। हम प्रभु को चाहें या ना चाहें, परन्तु वे प्रभु तो हमारे साथ प्रेम करते ही हैं । (वाजेषु) = संसार के संग्रामों में वे प्रभु ही (अविता भुवत्) = हमारे रक्षक होते हैं, अथवा (वाजेषु) = शक्तियों के प्राप्त कराने में वे प्रभु ही (अविता) = [अव्= भागदुघे] उत्तम भाग प्रदान करनेवाले भुवत् होते हैं । शक्ति देकर (वृधे भुवत्) = सब प्रकार से हमारी वृद्धि के लिए होते हैं (उत) = और (तनूनाम् त्राता) = हमारे शरीरों के रक्षक भी तो प्रभु ही हैं। उस प्रभु की हमारे साथ कितनी नि:स्वार्थ प्रीति है। हमारी कितनी बड़ी कृतघ्नता होगी यदि हम इस प्रभु को भूल जाएँ । 
Essence
प्रभु तो हमें चाहते हैं, हम भी प्रभु और केवल प्रभु को ही को चाहनेवाले बनें ।
Subject
प्रभु तो हमें चाहते ही हैं