Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 695

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ भरा꣢꣯य सान꣣सि꣡रिन्द्रा꣢꣯य पवते सु꣣तः꣢ । सो꣢मो꣣ जै꣡त्र꣢स्य चेतति꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ ॥६९५॥

अ꣣य꣢म् । भ꣡रा꣢꣯य । सा꣣नसिः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । प꣣वते । सुतः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । जै꣡त्र꣢स्य । चे॓तति । य꣡था꣢ । वि꣢दे꣢ ॥६९५॥

Mantra without Swara
अयं भराय सानसिरिन्द्राय पवते सुतः । सोमो जैत्रस्य चेतति यथा विदे ॥

अयम् । भराय । सानसिः । इन्द्राय । पवते । सुतः । सोमः । जैत्रस्य । चे॓तति । यथा । विदे ॥६९५॥

Samveda - Mantra Number : 695
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) = यह सोम (भराय) = इसे धारण – शरीर में सुरक्षित रखनेवाले के लिए (सानसिः) = स्वर्ण होता है [सानसि = Gold] । सोने के समान अमूल्य तो यह वस्तु है ही । अथवा सानसि शब्द ‘षण्' = संभक्तौ धातु से बनकर प्रेम करना - To love, पूजना= To Worship अर्थों को कहता हुआ यह स्पष्ट करता है कि सोम की रक्षा से मनुष्य में प्रभु के व प्राणिमात्र के प्रति प्रेम बढ़ता है और यह उसे प्रभु का उपासक बनाता है। 'He prayeth best, who loveth best, both—man and bird and beast'=सभी से प्रेम ही तो प्रभु की प्रकृष्ट पूजा है। (सुतः) = उत्पन्न हुआ-हुआ यह सोम (इन्द्राय) = इन्द्रियों के वशी- इन्द्रियों के अधिष्ठाता – इन्द्र के लिए - (पवते) = पवित्र करनेवाला होता है । यह शरीर और मस्तिष्क को पवित्र कर देता है । (जैत्रस्य) = वासनाओं को जीतने के स्वभाववाले पुरुष के लिए यह (सोम:)= सोम (चेतति) = संज्ञानवाला होता है । जो व्यक्ति वासनाओं पर विजय पाना अपना स्वभाव ही बना लेता है, उसमें सुरक्षित हुआ हुआ यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है, अतः सदा उत्तम ज्ञानवाला होता है। इस जैत्र की बुद्धि सोम से समुज्ज्वल होकर (यथाविदे) = प्रत्येक वस्तु को अपने ठीक रूप में देखनेवाली होती है। सोम की रक्षा होते ही हमारी अविद्या नष्ट हो जाती है। इस अविद्यानाश से ही हमारे क्लेशों का भी नाश होता है और हम आत्म-आनन्द का अनुभव करते हैं ।
Essence
 सोम की रक्षा के द्वारा हम प्रभु के सच्चे पुजारी बनें, हमारे जीवन पवित्र हों तथा हम यथार्थ ज्ञान का लाभ करें ।
Subject
जैत्र का सोम