Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 684

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- पादनिचृत् (गायत्री) Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भी꣢꣫ षु णः꣣ स꣡खी꣢नामवि꣣ता꣡ ज꣢रितॄ꣣णा꣢म् । श꣣तं꣡ भ꣢वास्यू꣣त꣡ये꣢ ॥६८४॥

अ꣣भि꣢ । सु । नः꣣ । स꣡खी꣢꣯नाम् । स । खी꣣नाम् । अविता꣢ । ज꣣रितॄणा꣢म् । श꣣त꣢म् । भ꣣वासि । ऊत꣡ये꣢ ॥६८४॥

Mantra without Swara
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम् । शतं भवास्यूतये ॥

अभि । सु । नः । सखीनाम् । स । खीनाम् । अविता । जरितॄणाम् । शतम् । भवासि । ऊतये ॥६८४॥

Samveda - Mantra Number : 684
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह वामदेव इन असुर पुरियों के संहाररूप कार्य को करता हुआ प्रभु की उपासना करता है कि हे प्रभो ! आप (नः) = हम (सखीनाम्) = समान -ख्यानवालों के - समान दृष्टिकोणवालों के (अविता) = रक्षक हैं। प्रभु का उद्देश्य अज्ञानान्धकार को दूर करना है – इसी उद्देश्य से प्रभु ने सृष्टि के प्रारम्भ में वेदज्ञान दिया है। इन वामदेव सरीखे प्रभु के सखाओं के जीवन का उद्देश्य भी अज्ञानान्धकार को दूर करना ही होता है। इस कार्य में ये निर्भीकता से चलते हैं, चूँकि ये अनुभव करते हैं कि प्रभु उनके रक्षक हैं, प्रभु ने यह कार्य जब तक उनसे कराना है, प्रभु उनकी रक्षा करेंगे ही । ये कहते हैं कि हे प्रभो! (नः जरितॄणाम्) = हम स्तोताओं के आप (शतं सु ऊतये) = सैकड़ों प्रकार से उत्तम रक्षा के लिए (अभिभवासि) = चारों ओर होते हैं । यह अपने को उस प्रभु से आवृत अनुभव करते हुए सब प्रकार के भयों से ऊपर उठ जाते हैं ।
Essence
प्रभु का सखा प्रभु की रक्षा में विश्वास रखता है और निर्भीकता से लोकहित में प्रवृत्त रहता है।
Subject
प्रभु-रक्षा में विश्वास