Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 681

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न꣡ त्वावा꣢꣯ꣳ अ꣣न्यो꣢ दि꣣व्यो꣡ न पार्थि꣢꣯वो꣣ न꣢ जा꣣तो꣡ न ज꣢꣯निष्यते । अ꣣श्वाय꣡न्तो꣢ मघवन्निन्द्र वा꣣जि꣡नो꣢ ग꣣व्य꣡न्त꣢स्त्वा हवामहे ॥६८१॥

न꣢ । त्वा꣡वा꣢꣯न् । अ꣣न्यः꣢ । अ꣣न् । यः꣢ । दि꣣व्यः꣢ । न । पा꣡र्थि꣢꣯वः । न । जा꣡तः꣢ । न । ज꣡निष्यते । अश्वाय꣡न्तः꣢ । मघ꣣वन् । इन्द्र । वाजि꣡नः꣢ । ग꣣व्य꣡न्तः꣢ । त्वा꣣ । हवामहे ॥६८१॥

Mantra without Swara
न त्वावाꣳ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते । अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे ॥

न । त्वावान् । अन्यः । अन् । यः । दिव्यः । न । पार्थिवः । न । जातः । न । जनिष्यते । अश्वायन्तः । मघवन् । इन्द्र । वाजिनः । गव्यन्तः । त्वा । हवामहे ॥६८१॥

Samveda - Mantra Number : 681
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो ! (त्वावान्) = आप-जैसा (अन्यः) = दूसरा और कोई (दिव्यः) = द्युलोक में होनेवाला (न जात:) = न तो कोई हुआ है (न जनिष्यते) = और न ही होगा। आप सर्वशक्तिमान् व सर्वज्ञ हैं। चराचर के ईशान हैं, सभी के सुख-साधन में लगे हुए हैं। आपको छोड़कर ऐसा कौन है ? आप तो 'अ-द्वितीय' ही हैं । हे (मघवन्) = [मा+अघ] सब पापों से दूर - अपापविद्ध प्रभो ! हे (इन्द्र) = सर्वैश्वर्यशाली प्रभो! (अश्वायन्तः गव्यन्त:) = कर्मों में व्याप्त होनेवाली प्रशस्त कर्मेन्द्रियों की कामना करते हुए, निश्चय से अर्थों का ज्ञान देनेवाली दीप्त ज्ञानेन्द्रियों की कामना करते हुए हम (वाजिनः) = बल को अपनानेवाले (त्वा हवामहे) = आपको पुकारते हैं। आपके स्मरण से ही वासनाओं का विनाश होकर हमें उत्तम कर्मेन्द्रियों व शक्ति का लाभ होगा। -

‘अश् व्याप्तौ' धातु से बनकर अश्व शब्द कर्मों में व्याप्त होनेवाली कर्मेन्द्रियों का वाचक है गौ शब्द समझना, Understand इस अर्थवाली गम् धातु से बनकर अर्थतत्त्व का ज्ञान देनेवाली ज्ञानेन्द्रियों को कह रहा है । वाज शब्द शक्ति का वाचक है, उससे प्रशस्त अर्थ में 'इनि प्रत्यय' आया है। एवं, उत्तम कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों व शक्ति को चाहते हुए हम प्रभु को पुकारते हैं। प्रभु के अतिरिक्त इन्हें हमें प्राप्त करा ही कौन सकता है ?
Essence
हम निरन्तर प्रभु की स्तुति करें, वे चराचर के ईशान हैं, वे सभी के कल्याण की चिन्ता करते हैं। वे अद्वितीय है, उन्हीं से हमें इन्द्रिय-नैर्मल्य व शक्ति प्राप्त होगी ।
Subject
अद्वितीय