Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 680

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ शूर नोनु꣣मो꣡ऽदु꣢ग्धा इव धे꣣न꣡वः꣢ । ई꣡शा꣢न꣣म꣡स्य जग꣢꣯तः स्व꣣र्दृ꣢श꣣मी꣡शा꣢नमिन्द्र त꣣स्थु꣡षः꣢ ॥६८०॥

अ꣣भि꣢ । त्वा꣣ । शूर । ना꣡नु꣢꣯मः । अ꣡दु꣢꣯ग्धाः । अ । दु꣣ग्धाः । इव । धे꣡न꣢वः । ई꣡शा꣢꣯नम् । अ꣣स्य꣢ । ज꣡ग꣢꣯तः । स्व꣣र्दृ꣡श꣢म् । स्वः꣣ । दृ꣡श꣢꣯म् । ई꣡शा꣢꣯नम् । इ꣣न्द्र । तस्थु꣡षः꣢ ॥६८०॥

Mantra without Swara
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥

अभि । त्वा । शूर । नानुमः । अदुग्धाः । अ । दुग्धाः । इव । धेनवः । ईशानम् । अस्य । जगतः । स्वर्दृशम् । स्वः । दृशम् । ईशानम् । इन्द्र । तस्थुषः ॥६८०॥

Samveda - Mantra Number : 680
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वशियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ है । वह श्रेष्ठ वशी इसलिए बन पाया है कि वह 'मैत्रावरुणि' है, अर्थात् उसने प्राण और अपान की साधना की है। प्राणापान की साधना से ही वह इन्द्रियों के दोषों को दूर करके इन्द्रियों को वश में करनेवालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ बना है ।

यह वसिष्ठ कहता है कि – हे (शूर) = सब वासनाओं को शीर्ण करनेवाले प्रभो ! (त्वा) = आपको (अभि) = लक्ष्य करके (नोनुमः) = हम निरन्तर स्तुति करते हैं । प्रभु की स्तुति से ही वह वासनासमूह नष्ट हो पाता है। यह उपासना वह वृद्धावस्था में प्रारम्भ नहीं करता । कहा गया है कि (अदुग्धा इव धेनवः) = अभी अदुग्धदोह गौओं के समान हम यौवन में ही प्रभु का स्तवन करते हैं और कहते हैं कि हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् ! आप (अस्य जगतः) = इस सारे चर जगत् के (ईशानम्) = स्वामी हो । स्वामी ही नहीं, आप तो (स्वः दृशम्) - सभी के सुख का ध्यान करनेवाले हो [स्व:=सब तथा सुख, ईश्=To take care of], (तस्थुषः) = सब स्थावर जगत् के भी ईशान हो । इस स्थावर जगत् के ईशान होने से आप हमारे सुखों के लिए सब आवश्यक पदार्थों के देनेवाले हो । मैं तो आपके स्तवन में लगा हूँ और मेरा योगक्षेम आपको चलाना है।
 
Essence
हम यौवन में ही प्रभु की उपासना करें । वे हमारा योगक्षेम चलाएँगे । 
Subject
मैत्रावरुणि वसिष्ठ