Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 675

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पु꣣नानः꣡ सो꣢म꣣ धा꣡र꣢या꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो अर्षसि । आ꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ योनि꣢꣯मृ꣣त꣡स्य꣢ सीद꣣स्यु꣡त्सो꣢ दे꣣वो꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥६७५॥

पु꣣नानः꣢ । सो꣡म । धा꣡र꣢꣯या । अ꣣पः꣢ । व꣡सा꣢꣯नः । अ꣣र्षसि । आ । र꣣त्नधाः꣢ । र꣣त्न । धाः꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । सी꣣दसि । उ꣡त्सः꣢꣯ । उत् । सः꣣ । देवः꣢ । हि꣣रण्य꣡यः꣢ ॥६७५॥

Mantra without Swara
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि । आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः ॥

पुनानः । सोम । धारया । अपः । वसानः । अर्षसि । आ । रत्नधाः । रत्न । धाः । योनिम् । ऋतस्य । सीदसि । उत्सः । उत् । सः । देवः । हिरण्ययः ॥६७५॥

Samveda - Mantra Number : 675
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि ‘सप्तर्षयः' है । सात गुणों से युक्त सोम का इस मन्त्र में वर्णन है । सम्भवतः सात गुणयुक्त सोम का द्रष्टा होने के कारण ही ऋषि का नाम 'सप्तर्षयः' हो गया है। सोम के सात गुण निम्न हैं – १. (सोम) = हे वीर्य-शक्ते! तू (धारया) = अपनी धारणशक्ति से (पुनानः) = पवित्र करती हुई (अर्षसि) = शरीर में गति करती है । यह वीर्यशक्ति शरीर के अस्वस्थ करनेवाले तत्त्वों को शरीर से दूर करके उसे पवित्र रखती है, अतः शरीर स्वस्थ बना रहता है । २. हे सोम! तू (अपः) = कर्मों का (वसानः) = धारण करता हुआ अर्षसि प्राप्त होता है । वीर्य का दूसरा गुण यह है कि यह मनुष्य को क्रियाशील–पुरुषार्थी बनाता है । 'वि+ईर' धातु से बना यह शब्द विशेषगति की सूचना देता है। वीर्यवान् पुरुष सदा क्रियाशील व आलस्य से दूर होता है । निर्वीर्यता ही मनुष्य को अलस बनाती है। ३. (आ) = समन्तात् (रत्नधा) = रमणीयता को धारण करनेवाला यह सोम है। सोम से सारा शरीर रमणीय हो उठता है, कान्ति सम्पन्न बन जाता है। क्या शरीर, क्या मन, क्या बुद्धि, सभी श्रीसम्पन्न हो जाते हैं। ४. (योनिम् ऋतस्य सीदसि) = अन्त में यह सोम ऋत के उत्पत्ति-स्थान उस प्रभु में जाकर स्थित होता है । इस सोम के धारण से मनुष्य प्रभु की उपासना के योग्य बनता है । ।

५. (उत्सः) = यह सोम एक चश्मा है। इस सोम को शरीर में धारण करने पर एक स्वाभाविक आनन्द का प्रवाह बहता है जो शारीरिक स्वास्थ्य व मनःप्रसाद का सूचक है । ६. (देवः) = यह सोम मनुष्य को दिव्य प्रवृत्तिवाला बनाता है। इसे राग-द्वेष से ऊपर उठाता है । ७. (हिरण्ययः) = यह हिरण्यवाला है। [हिरण्यं वै ज्योतिः] यह मस्तिष्क को ज्योतिर्मय बनाता है । यही तो वस्तुतः ज्ञानाग्नि का ईंधन है । यह शरीर को स्वस्थ, मन को निर्मल और बुद्धि को दीप्त बनाता है।
Essence
सोम को धारण कर हम अपने शरीर को सप्त गुणयुक्त बनाएँ ।
Subject
सप्त-गुणयुक्त सोम के द्रष्टा