Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 674

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ना꣡ विश्वा꣢꣯न्य꣣र्य꣢꣫ आ द्यु꣣म्ना꣢नि꣣ मा꣡नु꣢षाणाम् । सि꣡षा꣢सन्तो वनामहे ॥६७४॥

ए꣣ना꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । अ꣡र्यः꣢ । आ । द्यु꣡म्ना꣡नि꣢ । मा꣡नु꣢꣯षाणाम् । सि꣡षा꣢꣯सन्तः । व꣣नामहे ॥६७४॥

Mantra without Swara
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम् । सिषासन्तो वनामहे ॥

एना । विश्वानि । अर्यः । आ । द्युम्नानि । मानुषाणाम् । सिषासन्तः । वनामहे ॥६७४॥

Samveda - Mantra Number : 674
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अर्य) = सब धनों के स्वामी प्रभो! हमें प्राप्त होनेवाले (मानुषाणाम्) = मनुष्य-सम्बन्धी (एना) = इन (विश्वानि) = सब (द्युम्नानि) = धनों का हम (आ-सिषान्त:) = चारों ओर विभाग करते हुए (वनामहे) = सेवन करें । =

मनुष्य इस बात को कभी न भूले कि सब धनों के वास्तविक 'अर्य' परमात्मा ही है। (अहं धनानि संजयामि शश्वतः) = प्रभु कहते हैं कि सनातन काल से मैं ही धनों का विजय करता हूँ । जिस दिन हम इस तत्त्व को समझ लेंगे, उस दिन हम धनों के स्वामी न रहकर निधि-प=Trustee हो जाएँगे और निधि के स्वामी के आदेश के अनुसार ही हम उस निधि का विनियोग करेंगे। तब हम अपने स्वास्थ्यरूप धन का विनियोग भी केवल अपने आनन्द के लिए न करके लोकहित के लिए करेंगे । हमारा ज्ञान भी लोकहित के लिए होगा ।

इस तत्त्व को समझनेवाला 'अमहीयु' अपने समाधि के आनन्द को भी अकेला भोगना उचित नहीं समझता, पार्थिव धन का तो उसे कभी मोह हो ही नहीं सकता ।
Essence
हम प्राप्त सम्पत्तियों का संविभाग-पूर्वक ही सेवन करें ।
Subject
विभागपूर्वक-सेवन