Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 671

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢म꣣ग्निं꣡ क꣢वि꣣च्छ꣡दा꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ जू꣣त्या꣡ वृ꣢णे । ता꣡ सोम꣢꣯स्ये꣣ह꣡ तृ꣢म्पताम् ॥६७१॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣ग्नि꣢म् । क꣣विच्छ꣡दा꣢ । क꣣वि । छ꣡दा꣢꣯ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । जू꣣त्या꣢ । वृ꣣णे । ता꣢ । सो꣢म꣢꣯स्य । इ꣡ह꣢ । तृ꣣म्पताम् ॥६७१॥

Mantra without Swara
इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे । ता सोमस्येह तृम्पताम् ॥

इन्द्रम् । अग्निम् । कविच्छदा । कवि । छदा । यज्ञस्य । जूत्या । वृणे । ता । सोमस्य । इह । तृम्पताम् ॥६७१॥

Samveda - Mantra Number : 671
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मैं (इन्द्रम्) = इन्द्र को–शक्ति के देवता को और (अग्निम्) = ज्ञान की देवता को वृणे-वरता हूँ। (ता) = वे दोनों इह मेरे जीवन में (सोमस्य) = सोम के द्वारा (तृम्पताम्) = प्रीणित हों । सोम से शक्ति की वृद्धि और ज्ञान का विकास होता है। उत्तम कर्मों में लगे रहने और स्वाध्याय की प्रवृत्ति से सोम की रक्षा होती है और सुरक्षित हुआ सोम शक्ति और ज्ञान की वृद्धि का कारण बनता है।

अग्नि के वरण का प्रकार ('कविच्छदा') = शब्द से सूचित हो रहा है। कवि क्रान्तदर्शी को कहते हैं । यह वस्तु को समझकर उसका हृदयग्राही चित्रण करता है । इस कवि की कृति काव्य कहलाती है। परमेश्वर सर्वमहान् कवि है। उनका वेदरूपी काव्य अजरामर काव्य है [ पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति ] । इस काव्य के मन्त्र हमें पापों से छादित करते हैं, बचाते हैं, अतः छन्द या छद् कहलाते हैं। इस कवि के छन्दों द्वारा हम अपने ज्ञान की वृद्धि करते हुए अग्निदेवता का वरण करते हैं। इसी प्रकार इन्द्र का वरण (यज्ञस्य) = यज्ञों के (जूत्या) = निरन्तर प्रवाह [Uninterrupted flow] 'के' से होता है । इन्द्र शतक्रतु हैं, जो भी मनुष्य शतशः क्रतुओं [यज्ञों] का करनेवाला होता है, वह इन्द्र को प्रीणित करता ही है । ('पुरुषो वाव यज्ञः') = के अनुसार जो यज्ञमय जीवनवाला बन जाता है, वही इन्द्र को आराधित कर पाता है। उसमें शक्ति की वृद्धि होती है और वह असुरों का संहार कर इन्द्र ही बन जाता है ।
Essence
हम वेदाध्ययन से अग्नि को तथा निरन्तर यज्ञों से इन्द्र को आराधित करें। हमारा जीवन स्वाध्याय व यज्ञमय हो ।
 
Subject
इन्द्र व अग्नि का वरण