Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 668

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ब्र꣣ह्मा꣡ण꣢स्त्वा यु꣣जा꣢ व꣣य꣡ꣳ सो꣢म꣣पा꣡मि꣢न्द्र सो꣣मि꣡नः꣢ । सु꣣ता꣡व꣢न्तो हवामहे ॥६६८॥

ब्र꣣ह्मा꣡णः꣢ । त्वा꣣ । युजा꣢ । व꣣य꣢म् । सो꣣मपा꣢म् । सो꣣म । पा꣢म् । इ꣣न्द्र । सो꣡मिनः꣢ । सु꣣ता꣡वन्तः꣢ । ह꣣वामहे ॥६६८॥

Mantra without Swara
ब्रह्माणस्त्वा युजा वयꣳ सोमपामिन्द्र सोमिनः । सुतावन्तो हवामहे ॥

ब्रह्माणः । त्वा । युजा । वयम् । सोमपाम् । सोम । पाम् । इन्द्र । सोमिनः । सुतावन्तः । हवामहे ॥६६८॥

Samveda - Mantra Number : 668
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
'ब्रह्म' शब्द स्तोत्र - वाचक है, 'अन्' का अभिप्राय है जीवन । एवं [ब्रह्म + अन्] स्तोत्रमय जीवनवाले व्यक्ति ‘ब्रह्माण' हैं । (वयं ब्रह्माण:) = हम स्तोत्रमय जीवनवाले बनकर (त्वा युजा) = तुझसे संयुक्त होकर (सोमिनः) = उत्तम वीर्यशक्तिवाले बनकर हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (हवामहे) = आपको पुकारते हैं। प्रभु के साथ हमारा सम्पर्क स्तोत्रों द्वारा ही होता है हम प्रभु का स्तवन करेंगे और उस स्तवन से प्रभु के समीप पहुँचेंगे। प्रभु के समीप रहते हुए ही हम वासना से बचने पर सोमवाले होते हैं। इसी से मन्त्र में कहते हैं— हे प्रभो ! हम आपको पुकारते हैं । कैसे आपको ? (सोमपाम्) = आप जो
मेरे सोम की रक्षा करनेवाले हो और इस सोम की रक्षा होने पर हम (सुतावन्तः) = [सुतम्=यज्ञ] सदा उत्तम यज्ञोंवाले होते हैं । वीर्य-रक्षा से ही हममें वीरता [Virtues] की उत्पत्ति होती है।
Essence
स्तोत्रमय जीवनवाला ही सोमी - शक्तिशाली व सुतावान् - उत्तम यज्ञादि कर्मोंवाला बनता है ।
Subject
स्तोत्रमय जीवन