Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 662

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ नः꣢ पृ꣣थु꣢ श्र꣣वा꣢य्य꣣म꣡च्छा꣢ देव विवाससि । बृ꣣ह꣡द꣢ग्ने सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥६६२॥

सः꣢ । नः꣣ । पृ꣢थु । श्र꣣वा꣡य्य꣢म् । अ꣡च्छ꣢꣯ । दे꣣व । विवाससि । बृह꣢त् । अ꣣ग्ने । सु꣡वी꣢र्यम् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् ॥६६२॥

Mantra without Swara
स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि । बृहदग्ने सुवीर्यम् ॥

सः । नः । पृथु । श्रवाय्यम् । अच्छ । देव । विवाससि । बृहत् । अग्ने । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् ॥६६२॥

Samveda - Mantra Number : 662
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (देव) = ज्योतिर्मय प्रभो ! (सः) = आप (नः) = हमें (अच्छ) = सम्यक् तथा (पृथु) = विस्तृत श्(रवाय्यम्)-ज्ञान को विवाससि =[विवासयसि] विशेषरूप से धारण कराते हो और इस प्रकार श्रवाय्यम् यज्ञ में बलि दे देने के योग्य काम-क्रोध आदि वासनारूप पशुओं को [काम: पशुः, क्रोधः पशुः = उप० ] (विवाससि) = हमसे दूर भगा देते हो । ज्ञान का परिणाम वासना- विध्वंस होना ही चाहिए। 

हे अग्ने-आगे ले-चलनेवाले प्रभो ! हमें ज्ञान से पवित्र बनाकर वह (सुवीर्यम् )= उत्तम शक्ति प्राप्त कराइए जोकि बृहत् = सभी दृष्टियों से हमारी वृद्धि का कारण बनती है। बिना शक्ति के गुणों का वास नहीं होता । वीरता ही वरता को प्राप्त कराती है ।
Essence
ज्ञान और शक्ति को प्राप्त करके हम 'भरद्वाज-बार्हस्पत्य' बनें ।
Subject
विस्तृत ज्ञानवर्धक शक्ति
Footnote
सूचना–‘ श्रवाय्यम्' शब्द के दो अर्थ हैं— १. ज्ञान और २. यज्ञ में बलि देने योग्य पशु । यहाँ मन्त्रार्थ में दोनों ही अर्थ लिये गये हैं। ज्ञान के द्वारा काम-क्रोधादि वासनारूप पशुओं का नाश हो जाता है। ‘यज्ञ में उनकी बलि दे दी जाती है' इस वाक्य का अभिप्राय यह है कि मनुष्य वासनाओं की बलि देकर ही यज्ञ में प्रवृत होता है। । २. ‘विवाससि’ शब्द के भी दो अर्थ हैं— १. धारण कराते हो और २. दूर नष्ट करते हो [Vanish]। वे प्रभु ज्ञान को धारण कराकर वासनाओं को दूर करानेवाले हैं ।