Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 661

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣡ त्वा꣢ स꣣मि꣡द्भि꣢रङ्गिरो घृ꣣ते꣡न꣢ वर्धयामसि । बृ꣣ह꣡च्छो꣢चा यविष्ठ्य ॥६६१॥

त꣢म् । त्वा꣣ । समि꣡द्भिः꣢ । सम् । इ꣡द्भिः꣢꣯ । अ꣣ङ्गिरः । घृ꣡ते꣢न । व꣣र्द्धयामसि । बृह꣢त् । शो꣣च । यविष्ठ्य ॥६६१॥

Mantra without Swara
तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि । बृहच्छोचा यविष्ठ्य ॥

तम् । त्वा । समिद्भिः । सम् । इद्भिः । अङ्गिरः । घृतेन । वर्द्धयामसि । बृहत् । शोच । यविष्ठ्य ॥६६१॥

Samveda - Mantra Number : 661
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अङ्गिरः)=हमारे अंगों के रसभूत प्रभो! (तं त्वा)=उस आपको हम (समिद्भिः)=समिधाओं से (वर्धयामसि)=बढ़ाते हैं। जैसे अग्निहोत्र में समिधाएँ डाली जाती हैं, उसी प्रकार उपासनायज्ञ की समिधाएँ अथर्व के(‘इयं समित् पृथिवी द्यौर्द्वितीयोतान्तरिक्षं समिधा पृणाति') इस मन्त्र में 'पृथिवी, द्युलोक और अन्तरिक्ष' इस रूप में कही गयी हैं। पृथिवीस्थ पदार्थों का ज्ञान हमें अधिकाधिक प्रभु की महिमा को दिखलाता है। हिमाच्छादित पर्वतों के शिखर, समुद्र व मीलों-मील फैली मरुभूमि सभी प्रभु की महिमा का स्मरण कराते हैं । इसी प्रकार अन्तरिक्ष में उमड़ते हुए बादल व बहती हुई द दिलाती हैं, तो आकाश में चमकता हुआ सूर्य व बिखरे हुए तारे तो प्रभु की मानो स्तुति ही कर रहे हैं। इन सब पदार्थों के ज्ञान से हमारे मस्तिष्क में प्रभु की महिमा की छाप अधिकाधिक दृढ़रूप से अंकित हो जाती है। यही प्रभु का वर्धन है ।

(घृतेन) = घृत के द्वारा प्रभु के ज्ञान की अपने अन्दर वृद्धि करने के लिए ज्ञानरूप समिधाओं के साथ घृत=मानसमल-क्षरण [घृ-क्षरण] की भी आवश्यकता है। ज्ञान प्राप्ति के साथ हम अपने हृदयों को पवित्र बनाने का भी प्रयत्न करें। उज्ज्वल मस्तिष्क तथा पवित्र हृदय ये दोनों संगत होकर ही हमें प्रभु-दर्शन के योग्य बनाएँगे। अग्नि के वर्धन में घृत का जो स्थान है, वही प्रभु-दर्शन में मानसमल-क्षरण का। हम ज्ञान नैर्मल्य से प्रभु-दर्शन के लिए सन्नद्ध होंगे तो वे प्रभु हमें अधिक उज्ज्वल व निर्मल बना देंगे, अतः मन्त्र में कहते हैं कि – हे प्रभो ! (बृहत् शोच) = खूब ही दीप्त कर दीजिए। सहस्रों सूर्यों की ज्योति के समान आपकी ज्योति उदित होने पर भी क्या अन्धकार रह सकेगा? (यविष्ठ्य)=आप राग-द्वेषादि मलों को हमसे पृथक् करनेवालों में सर्वोत्तम हैं [यु-पृथक् करना, इष्ठ] = सबसे अधिक ।
Essence
ज्ञान व नैर्मल्य [समिधा+घृत] से मैं प्रभु-दर्शन करके ज्ञानमय व निर्मल बन जाऊँ ।
Subject
समिधाओं और घृत से