Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 658

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शतं वैखानसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢च्छा꣣ को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣢त꣣म꣡सृ꣢ग्रं꣣ वा꣡रे꣢ अ꣣व्य꣡ये꣢ । अ꣡वा꣢वशन्त धी꣣त꣡यः꣢ ॥६५८॥

अ꣡च्छ꣢꣯ । को꣡श꣢꣯म् । म꣣धुश्चु꣡त꣢म् । म꣣धु । श्चु꣡त꣢꣯म् । अ꣡सृ꣢꣯ग्रम् । वा꣡रे꣢꣯ । अ꣣व्य꣡ये꣣ । अ꣡वा꣢꣯वशन्त । धी꣣त꣡यः꣢ ॥६५८॥

Mantra without Swara
अच्छा कोशं मधुश्चुतमसृग्रं वारे अव्यये । अवावशन्त धीतयः ॥

अच्छ । कोशम् । मधुश्चुतम् । मधु । श्चुतम् । असृग्रम् । वारे । अव्यये । अवावशन्त । धीतयः ॥६५८॥

Samveda - Mantra Number : 658
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(‘वारयति इति वार:') जो हमारी चित्तवृत्ति को वासनाओं से आक्रान्त होने से बचाता है, वह प्रभु 'वार' है। घोड़े की पूँछ के बाल जैसे मच्छर-मक्खी आदि को हटाते हैं, उसी प्रकार ये प्रभु भी हमसे वासनाओं को दूर करते हैं । (अश्वं न त्वा वारवन्तम्) = इस मन्त्रभाग में प्रभु को बालोंवाले घोड़े से उपमा दी गई है। ये प्रभु ‘वार' हैं, वार भी कैसे ? (अव्यये) = कभी नष्ट न होनेवाले। अनादिकाल से वे प्रभु हमारे हृदयस्थ होकर हमें वासनाओं से बचने की प्रेरणा दे रहे हैं । एक वानप्रस्थ इस (अव्यये वारे अच्छ) = अविनाशी वासना - निवारक प्रभु में स्थित होता हुआ - उसकी ओर अपनी चित्तवृत्ति को लगाता हुआ (कोशम्) = अपने अन्नमय आदि कोशसमूहों को (मधुश्चुतम्) = माधुर्य का टपकानेवाला (असृग्रम्) = बनाता है। उसका बोलना-चालना, आना-जाना, उठना-बैठना आदि स ही व्यवहार माधुर्य से भरे होते हैं। ये (धीतयः) = प्रभु का सतत ध्यान करनेवाले वानप्रस्थ अवावशन्त-प्रभु की निरन्तर कामना करते हैं, क्योंकि प्रभु का ध्यान उन्हें निर्मल बनाता है और इसी से वानप्रस्थ सभी में आत्मबुद्धि करते हुए मधुर व्यवहारवाले बनते हैं। सभी में ओत-प्रोत उस सूत्र को देखने से ये एकत्व का अनुभव करते हैं और राग-द्वेष से दूर हो जाते हैं।
Essence
सतत प्रभुनिष्ठ हम अपने को माधुर्य का पुञ्ज बनाएँ । एक वानप्रस्थ के प्रत्येक व्यवहार से माधुर्य ही टपकना चाहिए।
Subject
मधुश्चुत् कोश