Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 655

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हि꣣न्वानो꣢ हे꣣तृ꣡भि꣢र्हि꣣त꣡ आ वाजं꣢꣯ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्रमीत् । सी꣡द꣢न्तो व꣣नु꣡षो꣢ यथा ॥६५५॥

हि꣣न्वानः꣢ । हे꣣तृ꣡भिः꣢ । हि꣣तः꣢ । आ । वा꣡जम्꣢꣯ । वा꣣जी꣢ । अ꣣क्रमीत् । सी꣡द꣢꣯न्तः । व꣣नु꣡षः꣢ । य꣣था ॥६५५॥

Mantra without Swara
हिन्वानो हेतृभिर्हित आ वाजं वाज्यक्रमीत् । सीदन्तो वनुषो यथा ॥

हिन्वानः । हेतृभिः । हितः । आ । वाजम् । वाजी । अक्रमीत् । सीदन्तः । वनुषः । यथा ॥६५५॥

Samveda - Mantra Number : 655
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र के उत्तरार्ध में 'कश्यप मारीच' कौन बनता है ? इस प्रश्न का उत्तर इस रूप में दिया था कि सोम, शुक्र और गवाशिर, परन्तु पुनः प्रश्न उत्पन्न होता है कि सोम, शुक्र व गवाशिर भी कौन बन पाता है ? इस प्रश्न का उत्तर प्रस्तुत मन्त्र में इस प्रकार दिया गया है कि -

, १. (हेतृभिः हिन्वानः) =[हि=to send forth, impel=प्रेरणा देना, भेजना] जीवन में प्रेरणा देनेवाला व्यक्ति ‘हेता' कहलाता है, उन हेताओं से निरन्तर ' हिन्वानः ' प्रेरणा दिया जाता हुआ व्यक्ति ही सौम्यतादि गुणों से सम्पन्न होता है । जिन्हें उत्तम प्रेरणा देनेवाले माता-पिता, आचार्य व अतिथि प्राप्त होते हैं, वे ही उत्तम मार्ग पर आगे और आगे बढ़ते हुए 'कश्यप-मारीच'=ज्ञानी बना करते हैं ।

२. (हितः) = ज्ञानी वे बनते हैं जोकि माता-पिता आदि से सदा सन्मार्ग पर हित=निहित व स्थापित होते हैं। मनुष्य सदा त्रुटियाँ करता है, परिणामत: पग-पग पर मार्गभ्रष्ट होने का भय है । उस समय जो व्यक्ति इन गुरुओं से पुनः ठीक मार्ग पर स्थापित कर दिये जाते हैं, वे ही अन्त में ‘कश्यप मारीच' की स्थिति को पाते हैं ।

३. (वाजी वाजम् आ अक्रमीत्) = यह माता-पिता आदि से प्रेरणा पानेवाला व्यक्ति यदि वाजी [वज गतौ] क्रियाशील=active होता है तभी (वाजम्) = ज्ञान (आ अक्रमीत्) = प्राप्त करता है । क्रियाशील, पुरुषार्थी ही ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ पाता है।

४. वे क्रियाशील व्यक्ति ही (यथा वनुष:) = [वन्-to win] विजेताओं की भाँति (सीदन्त:) = [सद्-to go, proceed=प्र+सद्] विघ्न-बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते चलते हैं।

कश्यप मारीच बनने के लिए माता-पिता आदि की प्रेरणा के साथ बालक व युवा में भी सहज क्रियाशीलता व पुरुषार्थ का होना आवश्यक है। न अकेली प्रेरणा कार्य कर सकती है, न अकेला पुरुषार्थ। प्रेरणा और पुरुषार्थ का समन्वय होते ही ‘कश्यप मारीच' बन सकना सम्भव हो जाता है। 
Essence
हमें सदा गुरुओं की उत्तम प्रेरणा प्राप्त होती रहे और पुरुषार्थ हमें कभी छोड़ न जाए।
 
Subject
कौन बनता है ?