Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 647

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रं꣣ ध꣡न꣢स्य꣣ सा꣡त꣢ये हवामहे꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡प꣢राजितम् । स꣡ नः꣢ स्वर्ष꣣द꣢ति꣣ द्वि꣢षः꣣ स꣡ नः꣢ स्वर्ष꣣द꣢ति꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥६४७

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ध꣡न꣢꣯स्य । सा꣣त꣡ये꣢ । ह꣣वामहे । जे꣡ता꣢꣯रम् । अ꣡प꣢꣯राजितम् । अ । प꣣राजितम् । सः꣢ । नः꣣ । स्वर्षत् । अ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । सः꣢ । नः꣣ । स्वर्षत् । अ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ ॥६४७॥

Mantra without Swara
इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् । स नः स्वर्षदति द्विषः स नः स्वर्षदति द्विषः ॥६४७

इन्द्रम् । धनस्य । सातये । हवामहे । जेतारम् । अपराजितम् । अ । पराजितम् । सः । नः । स्वर्षत् । अति । द्विषः । सः । नः । स्वर्षत् । अति । द्विषः ॥६४७॥

Samveda - Mantra Number : 647

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला, बलयुक्त कर्मों को करनेवाला, ऐश्वर्यशाली राष्ट्र का शासक ‘इन्द्र’ कहलाता है। इसका प्रथम कर्त्तव्य इन शब्दों में सूचित हुआ है कि (इन्द्रम्) = राजा को (धनस्य) = धन के (सातये) = उचित संविभाग के लिए (हवामहे) = पुकारते हैं। जिस राष्ट्र में धन कुछ व्यक्तियों में केन्द्रित हो जाता है, वह राष्ट्र उसी प्रकार रोगी हो जाता है जिस प्रकार वह शरीर जिसमें रुधिर किसी एक अङ्ग में इकट्ठा हो जाए। राजा धन को एक स्थान पर केन्द्रित न होने दे। 

२. (जेतारम्) = उस राजा को पुकारते हैं जो विजयशील है, (अपराजितम्) = कभी पराजित नहीं होता। राजा स्वयं तो व्यसनी होना ही नहीं चाहिए, वह राष्ट्र के बाह्य शत्रुओं का भी अभिभव कर सके। प्रजा विजेता का ही साथ देती है।

३. (सः) = वह राजा (न:) = हमें (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं से (अति) = परे (सु-अर्षत्) = उत्तमता से प्राप्त कराए। राष्ट्र में धर्म के नाम पर परस्पर घृणा प्रजा के लिए विनाशकारी है, निर्बल करनेवाली है । Secular state का अभिप्राय यही है कि वह प्रभु की उपासना के प्रकारविशेष पर बल देनेवाली न हो। राष्ट्र को

४. (पूर्वस्य) = [पूर्व पूरणे] राष्ट्र में शिक्षा भरनेवाले हे (अद्रिवः) = वज्रवाले राजन्! (यत्) = जो (ते) = तेरी (अंशुः) = ज्ञानकिरण है- ज्ञान का सर्वत्र प्रसारण है, यह (मदाय) = राष्ट्र के वास्तविक हर्ष का कारण बनती है। राष्ट्र का कोई व्यक्ति अशिक्षित न रह जाए इस बात के लिए राजा को व्यवस्था करनी है। जो माता-पिता शिक्षा के योग्य बालकों को शिक्षणालयों में न भेजें वे दण्डनीय हों। ‘अद्रिवः' शब्द राजा के हाथ में वज्र देकर यही सूचित कर रहा है।

५. हे (वसो) = उत्तम ढङ्ग से प्रजा को बसानेवाले राजन्! (नः) = हम सबको सुम्ने सुम्न में (आधेहि) = सर्वथा स्थापित कीजिए। सुम्न शब्द का प्रथम अर्थ है- (सु) = उत्तम (म्न) = अभ्यास, उत्तम ज्ञान की प्राप्ति। इसका दूसरा अर्थ Hymn = स्तोत्र व प्रभुस्तवन है और तीसरा यह आनन्द का वाचक है। राजा को चाहिए उसकी प्रजा ज्ञानयुक्त होकर प्रभु की स्तुति करनेवाली बने और इस प्रकार आनन्द का लाभ करे।

६. (शविष्ठ) = हे गतिशील व शक्तिशाली राजन्! (पूर्तिः) = प्रजा का पालन व पूरण ही (शस्यते) = तेरा प्रशंसित कर्म है। तूने उत्तम राष्ट्र-व्यवस्था के द्वारा प्रजा को पूर्णता की ओर ले-चलना है। उनका शरीर स्वस्थ हो, मन निद्वेष हो, बुद्धि प्रकाशमय हो।

७. (वशी) = जो स्वयं अपने पर काबू कर प्रजाओं को भी वश में कर सकता है (हि) = निश्चय से वही (शक्रः) = समर्थ होता है- शासन-व्यवस्था चला पाता है, एवं, राजा को स्वयं व्यसनों से अवश्य ऊपर उठना चाहिए।

यदि राजा इस प्रकार राष्ट्र का शासन करता हुआ अपने इन कर्त्तव्यों का पालन करता है (तत्) = तो वह (नूनम्) = [न ऊनम्] पूर्ण तथा नव्यं [नु स्तुतौ] प्रशंसनीय (संन्यसे) = प्रभु की पूजा करता है। राजा की सच्ची प्रभु-पूजा यही है कि वह उपर्युक्त राज-कर्त्तव्यों में लगा रहे । [O king this is your perfect and praiseworthy worship.]
Subject
प्रजापति का कर्त्तव्य