Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 64

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उपस्तुतो वार्हिष्टव्यः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
चि꣣त्र꣢꣫ इच्छिशो꣣स्त꣡रु꣢णस्य व꣣क्ष꣢थो꣣ न꣢꣫ यो मा꣣त꣡रा꣢व꣣न्वे꣢ति꣣ धा꣡त꣢वे । अ꣣नूधा꣡ यदजी꣢꣯जन꣣द꣡धा꣢ चि꣣दा꣢ व꣣व꣡क्ष꣢त्स꣣द्यो꣡ महि꣢꣯ दू꣣त्यां꣢३꣱च꣡र꣢न् ॥६४॥

चि꣣त्रः꣢ । इत् । शि꣡शोः꣢꣯ । त꣡रु꣢꣯णस्य । व꣣क्षथः꣢ । न । यः । मा꣣त꣡रौ꣢ । अ꣣न्वे꣡ति꣣ । अ꣣नु । ए꣡ति꣢꣯ । धा꣣त꣢꣯वे । अ꣣नूधाः꣢ । अ꣣न् । ऊधाः꣢ । यत् । अ꣡जी꣢꣯जनत् । अ꣡ध꣢꣯ । चि꣣त् । आ꣢ । व꣣व꣡क्ष꣢त् । स꣣द्यः꣢ । स꣣ । द्यः꣢ । म꣡हि꣢꣯ । दू꣣त्य꣢꣯म् । च꣡र꣢꣯न् ॥६४॥

Mantra without Swara
चित्र इच्छिशोस्तरुणस्य वक्षथो न यो मातरावन्वेति धातवे । अनूधा यदजीजनदधा चिदा ववक्षत्सद्यो महि दूत्यां३चरन् ॥

चित्रः । इत् । शिशोः । तरुणस्य । वक्षथः । न । यः । मातरौ । अन्वेति । अनु । एति । धातवे । अनूधाः । अन् । ऊधाः । यत् । अजीजनत् । अध । चित् । आ । ववक्षत् । सद्यः । स । द्यः । महि । दूत्यम् । चरन् ॥६४॥

Samveda - Mantra Number : 64
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मानव जीवन का प्रथम पड़ाव ब्रह्मचर्यकाल है। इसमें (शिशो:) = शिशु [शो तनूकरणे] अपनी बुद्धि को तीव्र करनेवाले का तथा (तरुणस्य)=तरुण [तृ] वासनाओं को तैर जानेवाले का (वक्षथः) = विकास [वक्ष=to wax, to grow] (चित्र इत्) = सचमुच अद्भुत है। ब्रह्मचर्यकाल में यदि उसने दो बातों का ही ध्यान रक्खा कि १. बुद्धि को तीव्र करना है तथा २. वासनाओं का शिकार नहीं होना है तो यह उसकी प्रशंसनीय सफलता होगी।

इसके बाद गृहस्थ में वह (धातवे) = पालन-पोषण के लिए (मातरौ अनु) = माता-पिता के पीछे (न एति) = नहीं जाता तो यह प्रशंसनीय है। गृहस्थ में तो प्रवेश ही तब करना चाहिए जबकि ‘धीं श्रीं स्त्रीम्' - ज्ञान व धन का उसने सम्पादन कर लिया हो । गृहस्थ बनकर तो उसे स्वयं माता-पिता की सेवा करनी है, न कि सेवा लेनी है।

अब गृहस्थ का सम्यक् पालन करने के बाद (यत्) = जब वह अपने को ('अनूधा: ') = अन्तःपुर [secret apartments] निज घर के बिना (अजीजनत्) = कर लेता है, अर्थात् वानप्रस्थ बन जाता है और उसकी कुटिया के द्वार सबके लिए खुला रहता है तो यह भी बड़ी प्रशंसनीय बात है।

(अध चित्) = अब इस वानप्रस्थ के बाद ही, संन्यासी बन (सद्य:) = वह शीघ्र ही महि (दूत्याम्) = महान् दूतकर्म को (चरन्) = करता हुआ (आववक्षत्) = वेदज्ञान को सर्वत्र ले जाता है अर्थात् पहुँचाता है। इस प्रकार अपने जीवन के तीनों पड़ावों को प्रशंसनीय प्रकार से बिताता हुआ यह सचमुच इस मन्त्र का ऋषि 'उपस्तुत' बनता है। हृदय की वासनाओं के उद्बर्हण के कारण स्तुति किये जाने से यह 'वार्ष्टिहव्य' कहलाता है।
Essence
जीवन के चारों पड़ावों को हम बड़े सुन्दर प्रकार से तय करें।
Subject
आदरणीय मानव जीवन के चार पड़ाव
Footnote
सूचना- मातरौ का अर्थ माता-पिता करना कुछ कठिन है, उस स्थिति में रूप 'मातापितरौ' या ‘पितरौ' बनता है। यहाँ वास्तव में माता और mother-in-law से अर्थ है। आजकल युवक पिता न भी दें तो माता से मांग लेते हैं और mother-in-law से माँगना तो अधिकार ही समझते हैं। वे भी तङ्ग हैं - यह तङ्गी ('जामाता दशमो ग्रहः') इस वाक्य से व्यक्त है।