Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 629

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
चि꣣त्रं꣢ दे꣣वा꣢ना꣣मु꣡द꣢गा꣣द꣡नी꣢कं꣣ च꣡क्षु꣢र्मि꣣त्र꣢स्य꣣ व꣡रु꣢णस्या꣣ग्नेः꣢ । आ꣢प्रा꣣ द्या꣡वा꣢पृथि꣣वी꣢ अ꣣न्त꣡रि꣢क्ष꣣ꣳ सू꣡र्य꣢ आ꣣त्मा꣡ जग꣢꣯तस्त꣣स्थु꣡ष꣢श्च ॥६२९॥

चि꣣त्र꣢म् । दे꣣वा꣡ना꣢म् । उत् । अ꣣गात् । अनी꣢कम् । चक्षुः । मित्र꣢स्य । मि । त्रस्य । वरु꣢णस्य । अग्नेः । आ । अ꣣प्राः । द्या꣡वा꣢꣯ । पृ꣣थिवी꣡इति꣢ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षम् । सू꣡र्यः꣢꣯ । आ꣣त्मा꣢ । ज꣡ग꣢꣯तः । त꣣स्थु꣡षः꣢ । च꣣ ॥६२९॥

Mantra without Swara
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षꣳ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥

चित्रम् । देवानाम् । उत् । अगात् । अनीकम् । चक्षुः । मित्रस्य । मि । त्रस्य । वरुणस्य । अग्नेः । आ । अप्राः । द्यावा । पृथिवीइति । अन्तरिक्षम् । सूर्यः । आत्मा । जगतः । तस्थुषः । च ॥६२९॥

Samveda - Mantra Number : 629
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का ब्रह्माश्रमी प्रजापालन के लिए सर्वत्र प्रवचन करता हुआ उस प्रभु का स्मरण इन शब्दों में करता है १. (देवानाम्) = सूर्यादि सब देवों का (चित्रं अनीकम्) = अद्भुत बल-सब देवताओं को देवत्व प्राप्त करानेवाला वह प्रभु (उदगात्) = मेरे हृदयान्तरिक्ष में उदित हुआ है। २. वह प्रभु (मित्रस्य) द्युलोकस्थ सूर्य का (वरुणस्य) = अन्तरिक्ष - समुद्र-स्थित ‘चन्द्र' का और (अग्ने:) = पृथिवीलोक में स्थित अग्निदेव का (चक्षुः) = प्रकाशक है। ये सब देव उस प्रभु के प्रकाश से ही प्रकाशित हो रहे हैं। ('तस्य भासा सर्वमिदं विभाति')। ३. वे प्रभु (द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं) = द्युलोक, पृथिवीलोक व अन्तरिक्षलोक को (आ-प्राः) = समन्तात् व्याप्त किये हुए हैं—वह प्रभु सर्वत्र परिपूर्ण हैं। ४. (सूर्यः) = सब जड़ जगत् को वे गति दे रहे हैं और चेतन-जगत् को प्रेरणा प्राप्त करा रहे हैं । ५. वे (जगतः तस्थुषः च) = जङ्गम और स्थावर की (आत्मा) = आत्मा हैं। वस्तुतः यह सारा चराचर जगत् उस प्रभु का शरीर ही है - वह सबके अन्दर स्थित हुआ हुआ अन्तर्यामिरूपेण इस सारे जगत् का नियमन कर रहा है।

इस प्रकार प्रभु का उपस्थान करनेवाला यह ब्रह्माश्रमी सर्वत्र उस प्रभु की महिमा को देखता है, अपने हृदय में भी उसी को व्याप्त अनुभव करता है। उसकी अन्तर्य्यामिता को अनुभव करने के कारण यह सब दुर्भावनाओं को कुचलनेवाला 'कुत्स' कहलाता है [कुथ हिंसायाम्]। सद्भावों के कारण इसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग का भी सद्भाव होता है और यह 'आंगिरस' बनता है।
Essence
अन्दर-बाहर सर्वत्र प्रभु की व्याप्ति का अनुभव करते हुए हम दुर्भावनाओं व दुर्बलताओं से ऊपर उठें।
Subject
ब्रह्माश्रमी का ब्रह्मोपस्थान-उप-स्थान