Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 624

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
य꣢꣫द्वर्चो꣣ हि꣡र꣢ण्यस्य꣣ य꣢द्वा꣣ व꣢र्चो꣣ ग꣡वा꣢मु꣣त꣢ । स꣣त्य꣢स्य꣣ ब्र꣡ह्म꣢णो꣣ व꣢र्च꣣स्ते꣡न꣢ मा꣣ स꣡ꣳ सृ꣢जामसि ॥६२४

य꣢त् । व꣡र्चः꣢꣯ । हि꣡र꣢꣯ण्यस्य । यत् । वा꣣ । व꣡र्चः꣢꣯ । ग꣡वा꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । स꣣त्य꣡स्य꣢ । ब्र꣡ह्म꣢꣯णः । व꣡र्चः꣢꣯ । ते꣡न꣢꣯ । मा꣣ । स꣢म् । सृ꣣जामसि ॥६२४॥

Mantra without Swara
यद्वर्चो हिरण्यस्य यद्वा वर्चो गवामुत । सत्यस्य ब्रह्मणो वर्चस्तेन मा सꣳ सृजामसि ॥६२४

यत् । वर्चः । हिरण्यस्य । यत् । वा । वर्चः । गवाम् । उत । सत्यस्य । ब्रह्मणः । वर्चः । तेन । मा । सम् । सृजामसि ॥६२४॥

Samveda - Mantra Number : 624
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो! (यत्) = जो (वर्च:) = तेज (हिरण्यस्य) = वीर्यशक्ति का है (तेन) = उससे (मा) = मुझे (संसृजामसि) = संयुक्त कीजिए। यह शक्ति रोगों को दूर कर रमणीयता को प्राप्त कराने से सचमुच 'हिरण्य' है और वस्तुतः यही मूलशक्ति है - इसी पर अन्य शक्तियाँ निर्भर करती हैं। (वा) = और (यत्) = जो (वर्चः) = शक्ति (गवाम्) = इन्द्रियों की है, उससे मुझे युक्त कीजिए। मेरी एक - एक इन्द्रिय आजीवन सशक्त बनी रहे। अपने-अपने कार्यों को करने में इन्द्रियों की शक्ति अन्त तक ठीक बनी रहे। संक्षेप में–शरीर नीरोग हो और इन्द्रियाँ सबल (उत) = शरीर व इन्द्रियों की शक्ति के साथ जो (सत्यस्य) = सत्य का तेज है, वह मेरे मन को सबल बनाये | (ब्रह्मणः वर्चः) = ज्ञान का तेज मेरे विज्ञानमयकोश को उज्ज्वल करे।

गत मन्त्र में प्रभु के स्तोता का उल्लेख था । वह अपने जीवन को जिन वर्चस् व तेजों से अलंकृत करता है, उनका वर्णन प्रस्तुत मन्त्र में है। 'अनुष्टुप् छन्द के परिणामस्वरूप ही यह 'वामदेव गोतम' अपने सब शोकों को समाप्त [जवच] करनेवाला होता है। 'शरीर नीरोग है, इन्द्रियाँ शक्तिशाली हैं, शक्ति के द्वारा मन पवित्र हो गया है और ज्ञान से मस्तिष्क उज्ज्वल है, इससे अधिक और चाहिए ही क्या?
Essence
मुझे शक्ति व इन्द्रियों की संसिक्तता के साथ सत्य व ज्ञान का नेत्र प्राप्त हो । 
Subject
वर्चस् की प्राप्ति