Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 621

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- नारायणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त꣡तो꣢ वि꣣रा꣡ड꣢जायत वि꣣रा꣢जो꣣ अ꣢धि꣣ पू꣡रु꣢षः । स꣢ जा꣣तो꣡ अत्य꣢꣯रिच्यत प꣣श्चा꣢꣫द्भूमि꣣म꣡थो꣢ पु꣣रः꣢ ॥६२१॥

त꣡तः꣢꣯ । वि꣣रा꣢ट् । वि꣣ । रा꣢ट् । अ꣣जायत । वि꣣रा꣢जः । वि꣣ । रा꣡जः꣢꣯ । अ꣡धि꣢꣯ । पू꣡रु꣢꣯षः । सः । जा꣣तः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣣रिच्यत । पश्चा꣢त् । भू꣡मि꣢꣯म् । अ꣡थ꣢꣯ । उ꣣ । पुरः꣢ ॥६२१॥

Mantra without Swara
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥

ततः । विराट् । वि । राट् । अजायत । विराजः । वि । राजः । अधि । पूरुषः । सः । जातः । अति । अरिच्यत । पश्चात् । भूमिम् । अथ । उ । पुरः ॥६२१॥

Samveda - Mantra Number : 621
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु ने जब प्रकृति-समुद्र से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया (ततः) = तब प्रारम्भ में एक चमकता हुआ (विराट्) = विराट् पिण्ड (अजायत) = उत्पन्न हुआ। यही वैज्ञानिकों का नेब्युला [Nebula] है।

(विराजः अधि पुरुष:) = इस विराट् पिण्ड का अधिष्ठाता वह सर्वव्यापक प्रभु ही था। (सः) = प्रभु से अधिष्ठित यह विराट् पिण्ड (जात:) = जब प्रादुर्भूत हुआ तो (अति) = अतिशयेन (अरिच्यत) = विरेचन-सा करनेवाला हुआ और (पश्चात्) = इस क्रिया के होने पर (भूमिम्) = प्राणियों के निवासस्थानभूत [भवन्ति भूतानि यस्याम्] लोकों को (अथो) = और (पुर:) = पालन- पूरण करनेवाले सभी पदार्थों को उसने अपने में से विवक्त कर डाला, अर्थात् लोकलोकान्तर और उनमें जीवन के लिए सब आवश्यक पदार्थ उत्पन्न हुए।
Essence
हम प्रभु की निर्मित इस सृष्टि के निर्माण को समझें और इसमें उसकी महिमा को देखने का प्रयत्न करें।
Subject
विराट् की उत्पत्ति